नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बच्चियों की सुरक्षा पर सवाल उठने लगे हैं। अधिकांश इलाकों में लड़कियां नक्सलियों की ज्यादती का शिकार हो रही हैं।
पिछले सप्ताह जब पुलिस ने कांकेर के आदिवासी कन्या आश्रम की लगभग एक दर्जन बच्चियों के साथ बलात्कार की घटना का खुलासा किया तो कई चौंकाने वाली जानकारियां सामने आईं। यह खबर आदिवासी बहुल छत्तीसगढ़ से देश की राजधानी दिल्ली तक जंगल की आग की तरह फैल गयी।
इसी तरह, राज्य के धुर नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में पिछले साल नवंबर महीने में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल और जिला पुलिस बल के संयुक्त दल को जंगल में 11 और 12 साल की दो बच्चियां मिली थीं। जब पुलिस दल ने उनसे पूछताछ की तो पता चला कि वे नक्सलियों की ज्यादती का शिकार हैं।
बीजापुर जिले के पुलिस अधीक्षक प्रशांत अग्रवाल के मुताबिक बच्चियों ने नक्सली सदस्य कुड़ियम गुज्जा, नागेश और शिवाजी का नाम लेकर आरोप लगाया था कि उन्होंने उनके (बच्चियों के) साथ बलात्कार किया है।
बच्चियों ने पुलिस को बताया कि यह सिलसिला काफी समय से चल रहा है, नक्सली उन्हें गांव आकर ले जाते हैं। बाल संघम के रूप में उनसे काम कराते हैं तथा डरा-धमका कर जबरन शारीरिक संबंध बनाते हैं। परिवार वालों के मना करने पर उन्हें जान से मार डालने अथवा गांव से निकाल देने की धमकी देते हैं। वहीं नक्सलियों ने उन्हें स्कूल भेजने से भी मना किया हुआ है।
जंगल से लड़कियों की बरामदगी के आठ दिन बाद पुलिस ने क्षेत्र से पांच नक्सलियों को गिरफ्तार किया जिनमें कुड़ियम गुज्जा भी था। गुज्जा पर बच्चियों ने बलात्कार का आरोप लगाया था।
अग्रवाल ने बताया कि पूछताछ में गुज्जा ने बताया था कि वह मोदकपाल थाना क्षेत्र में दो लड़कियों का अपहरण कर बलात्कार करने के प्रकरण में नक्सली नागेश, किशोर, और शिवाजी के साथ अपराध में शामिल था। वह इन्हीं लोगों के कहने पर गांवों से 10 से 12 वर्ष की कम उम्र की लड़कियों को शारीरिक शोषण के लिए लेकर जाता था।
राज्य के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में इन मामलों के सामने आने के बाद यहां बच्चियों की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो रहे हैं। राज्य के वरिष्ठ पत्रकार और लेखक अनिल पुसदकर कहते हैं कि प्रशासन की आसान पहुंच वाले और धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, दोनों जगहों से बच्चियों से ज्यादती की खबरें आ रही हैं।
वहीं, कांकेर में जो घटना हुई है, यह इस बात का प्रमाण है कि आदिवासी बालिकाओं के लिए योजना तो शुरू कर दी गई लेकिन इसके बेहतर क्रियान्वयन को लेकर कोई कोई ध्यान नहीं दिया गया। यहां पुलिस और प्रशासन की पहुंच आसान है इसलिए यह मामला सामने आ गया लेकिन अब धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के आश्रमों की भी जांच जरूरी है।
राज्य के बाल अधिकार संरक्षण अयोग के अध्यक्ष यशवंत जैन का मानना है कि केवल सरकार द्वारा कोई कदम उठाने से इस तरह के मामले पूरी तरह से नहीं रोके जा सकते हैं। इसके लिए समाज को कानून और प्रशासन के साथ सहभागिता निभानी होगी।
जैन के अनुसार कांकेर मामले में पंचायत की भूमिका खराब रही। यदि पंचायत अपनी भूमिका सही तरीके से निभाती तो आरोपियों पर पहले ही कार्रवाई हो सकती थी। वहीं धुर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी पूरे गांव और समाज को सामने आना होगा तब नक्सली बच्चियों के साथ ज्यादती नहीं कर सकेंगे।
इधर राज्य के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के मुताबिक राज्य के आदिवासी इलाकों खासकर नक्सल प्रभावित इलाकों में बच्चियों पर ज्यादती के लिए राज्य सरकार दोषी है।