छत्तीसगढ़ की गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं के लिए सरकार की योजनाएं कितनी प्रभावी हैं, इसका शर्मनाक उदाहरण मयूरचुंदी पंचायत में सामने आया है। यहां की एक विधवा महिला सुमित्रा बाई रहती हैं। उनके पति का निधन तीन वर्ष पहले हो चुका है। राशन कार्ड होने के बावजूद वह आज भी भूख से लड़ने को मजबूर हैं। हालात इतने गंभीर हैं कि दो बच्चों की मां सुमित्रा को पेट भरने के लिए गांव में भीख मांगनी पड़ रही है।
अंत्योदय का राशन कार्ड है, पर चावल नहीं
सुमित्रा बाई का नाम बीपीएल राशन कार्डधारकों की सूची में दर्ज है। अप्रैल माह में जब अन्य लोगों को चावल, चना व अन्य सामग्री मिली, तब सुमित्रा को केवल चना देकर टाल दिया गया। इसके बाद से लगातार दुकानदार से गुहार लगाने के बावजूद उन्हें चावल नहीं मिला। अब वह गांव में एक-एक घर जाकर बच्चों के लिए खाना मांगने को विवश हैं।
जमीन का पट्टा भी नहीं मिला
सुमित्रा ने बताया कि पति मलिया राम की मौत तीन साल पहले हो गई। चावल कभी मिलता है और कभी नहीं मिलता है। अप्रैल 2025 का चावल नहीं मिला है। जब चावल नहीं मिलता है तो अपना और दो बच्चों का पेट भरने के लिए गांव में घर-घर जाकर भीख मांगती हैं। जमीन भी नहीं है। जंगल में थोड़ा खेत बनाया है, लेकिन हाथी और बंदर फसल खा जाते हैं। उन्होंने अधिकार पट्टा का आवेदन दिया, लेकिन पट्टा नहीं मिला।
प्रशासन की नाकामी और लापरवाही उजागर
यह मामला शासन की उन योजनाओं को सवालों के घेरे में खड़ा करता है, जिनमें हर जरूरतमंद तक राशन पहुंचाने का दावा किया जाता है। मयूरचुंदी पंचायत में अगर राशन दुकान सही ढंग से संचालित होती और पारदर्शिता होती तो शायद सुमित्रा बाई जैसी महिला को यह दिन न देखना पड़ता। हालांकि ग्रामीणों ने फूड इंस्पेक्टर संदीप गुप्ता को इसकी शिकायत भेजी है, जो बुधवार सात मई को गांव में जाकर जांच करने की बात कह रहे हैं।