छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा है कि कोई धार्मिक संस्था या निजी निकाय कानून के तहत गठित अदालत का अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकता। धार्मिक मान्यताओं के आधार पर किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकारों या वैवाहिक स्थिति का निर्धारण अथवा उसे लागू नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट ने रायपुर की एक निजी शरिया संस्था द्वारा जारी तलाक के आदेश को रद्द करते हुए यह टिप्पणी की।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने रायपुर की ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ द्वारा 38 वर्षीय महिला को तलाकशुदा घोषित करने वाले आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि ऐसे गैर-न्यायिक मंचों द्वारा जारी फतवों या फैसलों की कोई बाध्यकारी कानूनी मान्यता नहीं है। अदालत ने 12 अगस्त को मामले में फैसला सुरक्षित रखा था और सोमवार को अपना निर्णय सुनाया।
याचिकाकर्ता निरोश अब्बासी ने ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ के 18 जनवरी 2022 के आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश में कथित तौर पर उन्हें ‘तीन तलाक’ के जरिए तलाकशुदा घोषित किया गया था। अब्बासी ने इस संस्था के अस्तित्व को भी चुनौती दी थी। उनका कहना था कि यह निकाय संविधान के प्रावधानों के विपरीत काम कर रहा है और उसे किसी व्यक्ति की वैवाहिक स्थिति तय करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
याचिकाकर्ता के पहले पति की 2015 में मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उन्होंने 2020 में रायपुर निवासी मोहम्मद आबिद खान से शादी की थी। खान का दावा था कि पहली शादी से अब्बासी के बच्चे नए परिवार के साथ तालमेल नहीं बिठा पा रहे थे। इसी आधार पर कथित तौर पर उन्हें ‘तीन तलाक’ दिया गया। अब्बासी ने इस कथित तलाक का विरोध किया और कहा कि भारत में लागू कानून पर धार्मिक कानून हावी नहीं हो सकता। उन्होंने खान और उनके परिवार के सदस्यों पर उत्पीड़न, क्रूरता और दुर्व्यवहार का आरोप लगाते हुए अक्टूबर 2021 में रायपुर के पुलिस अधीक्षक से शिकायत की थी। इसके बाद एफआईआर दर्ज की गई थी। हाईकोर्ट ने कहा कि एफआईआर दर्ज होने और सक्षम अधिकारियों के समक्ष मामला लंबित होने के बावजूद ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ ने 18 जनवरी 2022 को अपना आदेश जारी कर दिया।
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अदालत ने क्या कहा?
अदालत ने कहा कि धर्म किसी व्यक्ति के विवेक और व्यक्तिगत आस्था का मार्गदर्शन कर सकता है, लेकिन किसी धार्मिक संस्था या निजी निकाय को कानून के तहत गठित अदालत का अधिकार अपने हाथ में लेने या धार्मिक विश्वास के माध्यम से किसी व्यक्ति की कानूनी स्थिति और अधिकारों को तय करने या लागू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कानून का शासन और संवैधानिक व्यवस्था सर्वोपरि है। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता देवर्षि ठाकुर ने दलील दी कि महिला के सक्षम अधिकारियों के पास जाने के बावजूद निजी संस्था ने उसकी वैवाहिक स्थिति पर अधिकार जताने की कोशिश की।
याचिकाकर्ता का कहना था कि कोई भी निजी संस्था या खुद को शरिया अदालत बताने वाला निकाय संविधान और कानून के तहत स्थापित अदालतों के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं दे सकता। ऐसे निकाय किसी नागरिक के कानूनी अधिकारों और स्थिति को तय करने या बदलने वाले आदेश भी जारी नहीं कर सकते। राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता आरके गुप्ता ने कहा कि भारत की संवैधानिक और कानूनी व्यवस्था धर्म के आधार पर चलने वाली किसी समानांतर न्यायिक व्यवस्था को मान्यता नहीं देती।
उन्होंने कहा कि ‘शरिया कोर्ट’, ‘दारुल कजा’ या ‘काजी की अदालत’ के नाम से काम करने वाले निकायों को कोई वैधानिक मान्यता, न्यायिक अधिकार या दीवानी और वैवाहिक विवादों पर फैसला देने की शक्ति प्राप्त नहीं है। वहीं, ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ ने अपने जवाब में कहा कि वह एक धार्मिक और सलाहकारी संस्था है और उसके पास न्यायिक या वैधानिक शक्तियां नहीं हैं। संस्था ने कहा कि वह समानांतर न्यायिक व्यवस्था के रूप में काम नहीं करती और उसे अदालत का कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी विवाद का न्यायिक निपटारा करने की शक्ति वैध कानून से मिलनी चाहिए। अदालत ने कहा कि ‘दार-उल-कजा’ न तो कानून के तहत गठित है और न ही उसे कानून से मान्यता प्राप्त है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे निकाय द्वारा जारी फतवा केवल एक राय है और इसे अदालत के आदेश या डिक्री के रूप में नहीं माना जा सकता। यह न अदालत, न राज्य और न ही किसी व्यक्ति पर बाध्यकारी है। इसे कानूनी दबाव या जबरन लागू भी नहीं कराया जा सकता।
अदालत ने ये भी स्पष्ट किया
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘दार-उल-कजा’ के अस्तित्व या फतवा जारी करने की प्रथा को अवैध घोषित नहीं किया गया है। हालांकि, ऐसे निकाय कानून के तहत स्थापित अदालतों का दर्जा या अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकते। कोर्ट ने कहा कि ‘इदारा-ए-शरिया इस्लामी कोर्ट’ को संविधान या किसी कानून के तहत गठित अदालत नहीं माना जा सकता। उसे याचिकाकर्ता की वैवाहिक स्थिति पर फैसला करने या यह तय करने का अधिकार नहीं था कि वह तलाकशुदा हैं या नहीं।
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि इस संस्था द्वारा जारी कोई भी राय, फैसला या निर्णय कानूनी दबाव के जरिए लागू नहीं किया जा सकता और न ही उसे दीवानी या वैवाहिक अधिकारों पर बाध्यकारी फैसला माना जा सकता है। हालांकि, हाईकोर्ट ने तलाक-ए-हसन की संवैधानिक वैधता पर फैसला देने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह मुद्दा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।