फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

छत्तीसगढ़ः यहां हो रहा गीता और रामायण का विरोध

विज्ञापन
विज्ञापन
छत्तीसगढ़ की भारतीय जनता पार्टी सरकार के आदिवासियों को मुफ़्त में रामायण और गीता बांटने की योजना का विरोध शुरू हो गया है। राज्य के संस्कृति विभाग ने बस्तर में बोली जाने वाली गोंडी और हल्बी भाषा में इन दोनों हिन्दू धार्मिक ग्रंथों का अनुवाद प्रकाशित किया है।
विज्ञापन


राज्य के संस्कृति मंत्री दयालदास बघेल का कहना है कि दोनों ही ग्रंथ नीति शिक्षा के उद्देश्य से प्रकाशित किए गए हैं। पिछले कुछ सालों में छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाक़े में ईसाई और हिंदू संगठनों के बीच संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं।

धार्मिक संघर्ष
ये मामले इस हद तक बढ़े हैं कि सुप्रीम कोर्ट तक ने कहा है कि आदिवासियों को कुछ लोग हिंदू बताने की कोशिश कर रहे हैं तो कुछ ईसाई। सूबे में भाजपा की सरकार आने के बाद से धार्मिक संघर्ष और तेज़ हुआ है।
विज्ञापन


पिछले साल से ही विश्व हिंदू परिषद के हस्तक्षेप के बाद बस्तर की कुछ पंचायतों ने हिंदू धर्म के अलावा किसी भी दूसरे धर्म के प्रचार-प्रसार और यहां तक कि उनकी प्रार्थना को भी अपनी पंचायत में प्रतिबंधित कर दिया है।

छत्तीसगढ़ क्रिश्चिन फ़ोरम ने पंचायत के मामले में हाई कोर्ट में अपील कर रखी है। हालांकि फ़ोरम के अध्यक्ष अरुण पन्नालाल का कहना है कि अपील को दाख़िल किए हुए कई महीने हो गए हैं लेकिन केस में एक भी सुनवाई नहीं हुई है।
विज्ञापन

बढ़ेगा भाषा का प्रचार

अब बस्तर में रामायण और गीता बांटे जाने को इन्हीं धार्मिक प्रचार-प्रसार से जोड़ा जा रहा है। भारतीय वन सेवा के अधिकारी और संस्कृति विभाग के संचालक राकेश कुमार चतुर्वेदी इसे भाषा के प्रचार-प्रसार के तौर पर देख रहे हैं।

चतुर्वेदी कहते हैं, “गोंडी और हल्बी बोलने वालों की संख्या राज्य में बहुत कम है। ऐसे ग्रंथों के प्रकाशन से इन दोनों ही भाषाओं के विकास में सुविधा होगी।” आदिवासियों के बीच हिंदुओं के धार्मिक ग्रंथ बांटने के सरकार के इस फ़ैसले से सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के पक्षधर नाराज़ हैं।

सामाजिक कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज कहती हैं, “सरकार को अगर कुछ बांटना ही है तो वह वन अधिकार कानून, पंचायत क़ानून जैसी किताबों का अनुवाद कर बांट सकती थी। इससे बस्तर के आदिवासियों का भला ही होता।" वो कहती हैं, "लेकिन रामायण-गीता बांट कर वे किसका भला करना चाहते हैं, यह बात सब समझते हैं।”

संघ का एजेंडा
आदिवासी समाज और संस्कृति पर पिछले 50 सालों से शोध करने वाले निरंजन महावर ने बस्तर के आदिवासियों पर कई किताबें लिखी हैं। महावर कहते हैं, “राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस तरह से अपने एजेंडे पर काम करता है, यह केवल उसका नमूना है।”

पन्नालाल का कहना है कि सरकार आदिवासी इलाक़े में सिर्फ़ हिंदू ग्रंथ बांटने की योजना क्यों रखती है। उसे इसी तरह बाइबल और क़ुरान भी बांटने चाहिए।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें