दिल्ली एक तरह से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असंतोष जताने के अधिकार के लिए युद्ध क्षेत्र में तब्दील हो गया है और इस निष्कर्ष से भागना मुश्किल लग रहा है। पिछली बार हम लोगों ने इस तरह का असंतोष तब देखा था जब 16 दिसंबर, 2012 की रात 23 साल की मेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में सामूहिक बलात्कार किया गया था।
इस बार एक विश्वविद्यालय परिसर में लगाए गए नारों को लेकर आया उबाल बंटा हुआ है। लेकिन जो सवाल उठ रहे हैं, वो बेहद अहम हैं- क्या अब भी हम सरकार पर सवाल उठाने की स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं? क्या अब भी हम उन लोगों का सम्मान करते हैं जो दूसरों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए खड़े होते हैं?
दिल्ली से कोई 1500 किलोमीटर दूर छत्तीसगढ़ के बस्तर में, यही सवाल कहीं ज़्यादा विरोधी अंदाज़ में उठते रहे हैं, ऐसे सवालों के प्रति राज्य सरकार का दमन अपने चरम पर है।
स्थानीय कार्यकर्ता और पत्रकारों के लिए पुलिसिया पूछताछ आम बात है, लेकिन अब तो मनमानी तरीक़े से हिरासत में लेने का ख़तरा भी बढ़ गया है। स्थानीय पत्रकार संतोष यादव बीते पांच महीनों से फ़र्ज़ी आरोपों के तहत हिरासत में हैं, सितंबर, 2015 में हिरासत में लिए जाने से पहले भी पुलिस उनको प्रताड़ित किया करती थी।
एक बार तो उन्हें नंगा करके पीटा गया, क्योंकि वे इस क्षेत्र के आदिवासियों की दुर्दशा के बारे में रिपोर्टिंग किया करते थे और कइयों को उन्होंने क़ानूनी सहायता भी दिलवाई थी।
हज़ारों आदिवासियों पर नक्सली होने का आरोप लगाया जाता रहा है, इन संदिग्धों से छत्तीसगढ़ के जेल भरे हुए हैं। जगदलपुर क़ानूनी सहायता समूह के आंकड़ों की मानें तो राज्य की जेलों में 253 फ़ीसदी ज़्यादा क़ैदी बंद हैं, जबकि राष्ट्रीय औसत 114 फ़ीसदी का है। कांकेर में यह 428 फ़ीसदी ज़्यादा है।