राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत
- फोटो : अमर उजाला
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ केवल हिंदुओं के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र के भले के लिए कार्य करता है। उन्होंने स्वयंसेवकों का आह्वान किया कि वे किसी के प्रति घृणा फैलाए बिना शुद्ध सात्विक प्रेम और सद्भाव के आधार पर पूरे समाज को एकजुट करें। बिलासपुर के कोनी स्थित सरस्वती ग्राम शिक्षा परिषद संस्थान में आयोजित बौद्धिक वर्ग को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने संघ की तुलना समुद्र से करते हुए कहा कि जैसे पानी की एक-एक बूंद से समुद्र की पहचान बनती है, वैसे ही हर एक स्वयंसेवक से संघ की पहचान जुड़ी है। संघ का मूल उद्देश्य राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना है। इसलिए सभी सदस्यों को संगठित और सजग रहकर देश के विकास में योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्ष 1925 में स्थापना के बाद शुरुआती दौर में संघ की उपेक्षा हुई, फिर विरोध का सामना करना पड़ा और आज संघ की सराहना हो रही है। वर्तमान में अनुकूल माहौल को देखते हुए स्वयंसेवकों को अधिक सतर्कता के साथ काम करने की आवश्यकता है।
बौद्धिक वर्ग में भागवत ने कार्यकर्ताओं को संपर्क बढ़ाने का एक स्पष्ट सूत्र दिया। उन्होंने कहा कि हर स्वयंसेवक पहले किसी अनजान व्यक्ति से परिचय बढ़ाए, फिर उससे मित्रता करे और अंत में उसे स्वयंसेवक बनाए। उन्होंने पानी के रासायनिक सूत्र (H2O) का उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के परमाणुओं से जल बनता है, उसी प्रकार स्वयंसेवकों के जुड़ाव से ही संघ का निर्माण होता है।
अपने एक घंटे के इस संबोधन में उन्होंने स्वयंसेवकों को संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार के जीवन मूल्यों और आदर्श विचारों को अपनाने की सीख दी। इस कार्यक्रम में 540 से अधिक स्वयंसेवक उपस्थित रहे। संघ प्रमुख ने कहा कि संघ का आधार तीन प्रमुख स्तंभों पर टिका है, जिनमें शाखा, कुटुंब और अपनत्व शामिल हैं। उन्होंने बताया कि संघ के सभी आनुषांगिक संगठन पूरी तरह स्वतंत्र और स्वावलंबी हैं। जब भी इन संगठनों को वैचारिक मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है, तब संघ उन्हें दिशा दिखाता है।
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों के स्वरूप पर बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि आंदोलनों का ध्येय केवल राजनीतिक लाभ पाना या नफरत फैलाना नहीं होना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में आंदोलनों को समस्याओं के समाधान की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए और सभी कार्य सांविधानिक तथा कानूनी सीमाओं के भीतर ही होने चाहिए। उन्होंने विपक्षी दलों की ओर से संघ पर होने वाले हमलों के प्रति सतर्क रहने की हिदायत भी दी।
ब्रिटिश शासन काल का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि तत्कालीन अंग्रेज सरकार संघ को देशभक्त गढ़ने वाली संस्था मानती थी। इसी कारण सरकारी कर्मचारियों और उनके बच्चों के शाखाओं में जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था, जिसे भारी विरोध के बाद हटाना पड़ा। उन्होंने सचेत किया कि किसी एक स्वयंसेवक की भूल से पूरे संगठन की छवि प्रभावित हो सकती है, इसलिए सभी को अनुशासित रहकर काम करना होगा।
बौद्धिक वर्ग से पहले आयोजित बैठक में संघ के वर्षभर के कार्यों का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया। इस दौरान बताया गया कि बीते एक वर्ष में 2,311 नई शाखाएं शुरू की गई हैं, जिससे कुल शाखाओं की संख्या बढ़कर 5,500 पहुंच गई है। रायपुर में रात के समय काम करने वाले दुकानदारों के लिए रात्रि शाखा का सफल प्रयोग किया गया, जबकि मस्तूरी मंडल के स्वयंसेवकों ने 10 अलग-अलग स्थानों पर नई शाखाएं खोली हैं।