छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगरी सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में स्थान मिल गया है। इस उपलब्धि से प्रदेश की इस ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलने की उम्मीद जगी है। सिरपुर में लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुराने मंदिर, बौद्ध विहार, दुर्लभ मूर्तियां और उत्कृष्ट स्थापत्य कला के अवशेष मौजूद हैं। इस स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन धर्म की परंपराएं एक साथ विकसित हुईं।
दक्षिण कोसल की राजधानी रहा है सिरपुर
प्राचीन काल में सिरपुर को श्रीपुर के नाम से जाना जाता था। पांडुवंशी शासकों के शासनकाल के दौरान यह नगरी दक्षिण कोसल की राजधानी रही। उस दौर में सिरपुर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित हुआ। पांडुवंशी राजाओं ने यहां अनेक भव्य मंदिरों, विशाल बौद्ध विहारों, सरोवरों और उद्यानों का निर्माण कराया था।
सातवीं शताब्दी में प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस ऐतिहासिक क्षेत्र की यात्रा की थी। ह्वेनसांग ने अपने यात्रा विवरणों में सिरपुर में बौद्ध धर्म की समृद्ध और जीवंत परंपरा का विशेष रूप से उल्लेख किया था। सिरपुर की सबसे अनूठी विशेषता अलग-अलग धार्मिक पंथों का एक ही स्थान पर सौहार्दपूर्ण विकास है। यहां विभिन्न संप्रदायों के पूजा स्थल और सांस्कृतिक प्रतीक एक साथ मौजूद हैं, जो तत्कालीन समाज की धार्मिक उदारता को दर्शाते हैं।
प्रमुख स्थापत्य कला और पुरातात्विक धरोहर
सिरपुर की स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण यहां का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर है। यह मंदिर प्राचीन भारतीय ईंट स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना माना जाता है। इस ऐतिहासिक मंदिर का निर्माण लगभग 650 ईस्वी में हुआ था। इसका निर्माण पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन की माता रानी वासटा ने अपने पति हर्षगुप्त की पावन स्मृति में कराया था। मंदिर की बारीक नक्काशी और ईंटों की बनावट आज भी पर्यटकों को आकर्षित करती है।
महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल
इसके अलावा सिरपुर में आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार और तीवरदेव महाविहार जैसे महत्वपूर्ण बौद्ध स्थल स्थित हैं। ये विशाल विहार इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि सिरपुर कभी बौद्ध अध्ययन, शिक्षा और साधना का प्रमुख केंद्र रहा था। सिरपुर परिसर में स्थित सुरंग टीला, प्राचीन राम मंदिर और महानदी के तट पर बना गंधेश्वर महादेव मंदिर भी इस पुरातात्विक विरासत के प्रमुख अंग हैं।
दो हजार से अधिक दुर्लभ पुरावशेष
सिरपुर में संचालित पुरातात्विक खुदाई के दौरान दो हजार से अधिक दुर्लभ पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इन पुरावशेषों में धातु की कलात्मक मूर्तियां, आभूषण निर्माण के उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, दीपक, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं। ये अवशेष उस काल के जनजीवन, कला, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालते हैं। सिरपुर से प्राप्त भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, देवी तारा, तीर्थंकर ऋषभनाथ और भगवान विष्णु की धातु प्रतिमाएं देश के विभिन्न प्रतिष्ठित संग्रहालयों में सुरक्षित रखी गई हैं।
विश्व धरोहर दर्जा और विकास की संभावनाएं
छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक संपदा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने के लिए राज्य सरकार निरंतर प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व और पर्यटन तथा संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में सिरपुर के संरक्षण और पर्यटन विकास पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इसी कड़ी में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का गहन निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने इस धरोहर के संरक्षण तथा सिरपुर को यूनेस्को सूची में स्थान दिलाने के लिए प्राथमिकता से कार्य करने की प्रतिबद्धता जताई थी। यूनेस्को की अस्थायी सूची में स्थान मिलना पूर्ण विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त होने की प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण पड़ाव है।