झीरम घाटी मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी अदालत के फैसले के खिलाफ सर्व आदिवासी समाज ने बिलासपुर उच्च न्यायालय जाने का निर्णय लिया है। बस्तर संभाग के छह जिलों दंतेवाड़ा, बस्तर, सुकमा, नारायणपुर और कोंडागांव के समाज के पदाधिकारियों ने बैठक कर 10 दोषियों की सजा के खिलाफ अपील दायर करने की रणनीति बनाई है। इस कानूनी लड़ाई का खर्च उठाने के लिए समाज हर आदिवासी परिवार से 20 रुपये का चंदा जुटाएगा। वहीं, कांग्रेस ने भी वरिष्ठ वकीलों के माध्यम से कानूनी विकल्प तलाशने का फैसला किया है।
सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष प्रकाश ठाकुर के अनुसार, बैठक में छह जिलों के प्रतिनिधियों ने अदालती फैसले की समीक्षा की। समाज कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक दस्तावेज तैयार कर रहा है। पदाधिकारियों ने झीरम घाटी कांड की पूरी साजिश, संदिग्ध व्यक्तियों की भूमिका और आत्मसमर्पण कर चुके नक्सलियों की फिर से निष्पक्ष जांच कराने की मांग रखी है। समाज ने पुनर्वास नीति के अंतर्गत सरेंडर नक्सलियों को मिल रही सरकारी सुविधाओं और लाभ की समीक्षा करने तथा जेलों में बंद बेगुनाह आदिवासियों को छुड़ाने के लिए कानूनी लड़ाई जारी रखने की घोषणा की है।
दिल्ली में कानूनी और राजनीतिक रणनीति
रायपुर स्थित राजीव भवन में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज की अध्यक्षता में हुई बैठक में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल, नेता प्रतिपक्ष डॉक्टर चरणदास महंत और झीरम हमले में शहीद हुए नेताओं के परिजन शामिल हुए। पार्टी जल्द ही राष्ट्रीय नेतृत्व से समय लेकर दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएगी। इसके अलावा कांग्रेस एनआईए कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं से राय ले रही है।
हमले का इतिहास और जांच की स्थिति
बस्तर में 25 मई, 2013 को कांग्रेस की परिवर्तन यात्रा के दौरान दरभा क्षेत्र की झीरम घाटी में माओवादियों ने घात लगाकर हमला किया था। आईईडी विस्फोट और गोलीबारी में तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल, उनके बेटे दिनेश पटेल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष महेंद्र कर्मा और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल सहित कई नेताओं व सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी। एनआईए की 25 सितंबर, 2014 की चार्जशीट के अनुसार नक्सली 9 एमएम पिस्तौल, दो एके-47 राइफलें, 10 हैंड ग्रेनेड और सैकड़ों कारतूस लूटकर ले गए थे।