चंदन जात्रा पूजा विधान के बाद जगन्नाथ स्वामी के अस्वस्थता कालावधि अर्थात अनसर काल के दौरान भगवान जगन्नाथ के दर्शन वर्जित थे। भगवान के दर्शन से वर्जित होने से भगवान जगन्नाथ के सुदर्शन चक्र के रक्षा सूत्र से विलग होने जैसी व्याकुलता है। इसे दूर करने के लिए श्रीमंदिर के बाहर भक्तों-श्रद्धालुओं के नयनाभिराम के लिए भगवान का भक्तो-श्रधालुओं के पास आना, यह भगवान जगन्नाथ से आध्यात्मिक मिलन ही नेत्रोत्सव कहलाता है।
छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में गोंचा महापर्व पर सोमवार को नेत्रोत्सव पूजा विधान संपन्न कराया गया। इस दौरान भगवान को विशेष भोग अर्पित कर भक्तों में वितरित किया गया। भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र स्वामी के विग्रहों को श्रीमंदिर के गर्भगृह के सामने भक्तों के दर्शनार्थ स्थापित किए जाने के बाद 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के पदेन पाढ़ी-पानीग्राही ने शताब्दियों पुरानी परंपरा को पूरा कराया। भगवान जगन्नाथ स्वामी का अनसर काल में पांच से 18 जून तक दर्शन वर्जित था। अब मंगलवार को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली जाएगी।
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पदेन पानीग्राही रधाकांत पानीग्राही ने बताया कि नेत्रोत्सव पूजा विधान की परंपरा का निर्वहन शताब्दियों से उनके परिवार के द्वारा किया जा रहा है। नेत्रोत्सव पूजा की परंपरानुसार, भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र के विग्रहों की साज-श्रृंगार के साथ विधि-विधान से पूजन-हवन के साथ संपन्न किया जाता है। अनसर काल अवधि के बाद भगवान को आज विशेष भोग का अर्पण किया गया। उन्होने बताया कि 15 दिनों के बाद भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलभद्र स्वामी के दर्शन एवं भोग प्रसाद का विशेष महत्व होता है।