छत्तीसगढ़ में पॉम (ऑयल पाम) की खेती किसानों के लिए स्थायी आय का स्रोत बन रही है। उद्यान विभाग की तकनीकी मदद और केंद्र-राज्य सरकार की संयुक्त पहल से पॉम की खेती को नई दिशा मिल रही है। किसानों को प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष ढाई से तीन लाख रुपये तक की आमदनी हो सकती है। एक बार पौध रोपने के बाद तीसरे वर्ष से लेकर लगभग 30 वर्षों तक लगातार उत्पादन मिलता है।
राष्ट्रीय तिलहन एवं ऑयल पाम मिशन के तहत केंद्र और राज्य सरकार की ओर से किसानों को एक-एक लाख रुपये का अनुदान दिया जा रहा है। साथ ही निःशुल्क प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन भी प्रदान किया जा रहा है।
देशभर में और छत्तीसगढ़ में विस्तार
देश में अब तक 3.5 लाख हेक्टेयर भूमि पर पॉम का रोपण हो चुका है। वर्ष 2024-25 में पॉम ऑयल का घरेलू उत्पादन 15% बढ़ा है, और 2029-30 तक इसे 28 लाख टन तक पहुंचाने का लक्ष्य है। छत्तीसगढ़ में बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर, महासमुंद, रायगढ़ सहित 17 जिलों में पॉम की खेती हो रही है। पिछले चार वर्षों में 1,150 किसानों ने लगभग 1,600 हेक्टेयर में पॉम लगाया है, जबकि इस वर्ष 802 किसानों ने 1,089 हेक्टेयर में पौध रोपे हैं।
किसानों के अनुभव और सुविधाएं
रायगढ़ जिले के चक्रधरपुर गांव के किसान राजेंद्र मेहर ने 10 एकड़ में 570 पौध लगाए हैं। उन्होंने बताया कि पहले यह भूमि खाली पड़ी थी, लेकिन उद्यान विभाग के मार्गदर्शन के बाद उन्होंने खेती शुरू की। महासमुंद जिले में भी 611 हेक्टेयर में पॉम की खेती की जा रही है।
प्रति हेक्टेयर 29 हजार रुपये मूल्य के 143 पौधे निःशुल्क दिए जाते हैं। पौध रोपण, फेंसिंग, सिंचाई, रखरखाव और अंतरवर्तीय फसलों की कुल लागत लगभग चार लाख रुपये आती है, जिसमें से दो लाख रुपये अनुदान के रूप में दिए जाते हैं। शेष राशि के लिए बैंक ऋण की सुविधा है। इसके अलावा ड्रिप इरिगेशन, बोरवेल, पंप सेट, वर्मी कम्पोस्ट यूनिट, ट्रैक्टर-ट्रॉली आदि के लिए भी सब्सिडी उपलब्ध है।
उत्पादन और विपणन व्यवस्था
एक हेक्टेयर से हर वर्ष 15 से 20 टन उपज मिल सकती है, जिससे ढाई से तीन लाख रुपये तक की सालाना आय संभव है। पौधों के बीच में सब्जी या अन्य फसलें भी ली जा सकती हैं। बिक्री की चिंता भी नहीं है—केंद्र सरकार ने अनुबंधित कंपनियों की व्यवस्था की है, जो किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सीधे खेत से खरीदी करती हैं और भुगतान सीधे बैंक खाते में होता है।