सामान्य गृहिणी से सफल उद्यमी बनी कविता
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सिर्फ कुछ साल पहले अपनी कमाई के 13 हजार रुपये से सिलाई मशीन खरीदने वाली कविता वर्मा ने आज अपनी मेहनत के दम पर खुद की कार खरीद ली है। कपड़े और जूते के व्यवसाय से कविता सालाना लगभग 8 लाख रुपये तक की आय अर्जित कर रही है। सिलाई मशीन से एसयूवी तक के इस सफर में उन्होंने न सिर्फ अपने व्यवसाय को खड़ा किया, बल्कि आर्थिक स्वतंत्रता की मिसाल भी कायम की। उनकी सफलता का राज केवल कड़ी मेहनत और निरंतरता नहीं है, बल्कि नए विचारों को अपनाना, दूसरों से अलग दृष्टिकोण रखना, बेहतर डिज़ाइन और गुणवत्ता पर ध्यान देना, और नए व्यावसायिक तरीकों को अपनाना भी उनकी कामयाबी के अहम पहलू रहे हैं। संघर्षों के बीच अपनी लगन और दूरदर्शिता से कविता ने यह साबित कर दिया कि सही दिशा में किया गया प्रयास बड़े बदलाव ला सकता है।
तिल्दा के किरना गांव की कविता वर्मा का बचपन सिलाई-कढ़ाई और घरेलू कामों में बीता। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यही हुनर आगे चलकर उनकी पहचान बनेगा। शादी के बाद जब वह तिल्दा आई, तो उन्हें एक सख्त और पारंपरिक माहौल का सामना करना पड़ा। संयुक्त परिवार की बहू होने के कारण उनसे उम्मीद थी कि वे सिर्फ घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित रहें। घर की महिलाओं का बाहर जाकर काम करना यहां की परंपराओं के खिलाफ माना जाता था।
लेकिन जब आर्थिक तंगी ने घर के हालात मुश्किल बना दिए, तो कविता ने अपने हुनर को अपना हथियार बनाने का फैसला किया। कविता ने वंदना एसएचजी स्व सहायता समूह का हिस्सा बनकर शासकीय योजनाओं और शासन से मिलने वाले ऋणों के बारे में जानकारी इकट्ठा करना शुरू किया। बिहान में कार्य करते हुए अपने शुरुआती वेतन को बचाकर उन्होंने 13000 की सिलाई मशीन खरीदी थी जो अब भी उनकी बड़ी सी कपड़े की दुकान में सम्भाल कर रखी हुई है। सिलाई मशीन से कविता ने अपने घर में ही छोटे स्तर पर काम शुरू किया।
उनका लक्ष्य सिर्फ काम चलाना नहीं, बल्कि अपने बिज़नेस को बड़ा बनाना था। उन्होंने रणनीति बनाई कि ज्यादा बेचो, चाहे मुनाफा थोड़ा कम हो। पहले वह सिर्फ तिल्दा से सामान लाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे रायपुर, सूरत और दिल्ली से भी कपड़े मंगवाने लगीं। त्योहारों और शादी के सीजन में वह खुद खाना-पीना छोड़कर 15-15 घंटे तक काम करतीं, ताकि ज्यादा ऑर्डर पूरे कर सकें।