छत्तीसगढ़ में नक्सल हमले के बाद प्रदेश कांग्रेस में लंबे समय से चल रही गुटबाजी उभर कर सामने आ गई है। अजीत जोगी राज्य में दिग्विजय सिंह की बढ़ती भूमिका का विरोध कर रहे हैं।
केंद्रीय राज्यमंत्री चरणदास महंत को कार्यवाहक अध्यक्ष और भूपेश बघेल को कार्यक्रम समन्वयक बनाए जाने से भी जोगी समर्थक नाराज हैं।
माना जा रहा है कि महंत की नियुक्ति दिग्विजय सिंह और बघेल की नियुक्ति पार्टी कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के प्रयासों से हुई है।
छत्तीसगढ़ में विपक्ष के नेता रविंद्र चौबे भी अविभाजित मध्यप्रदेश में दिग्विजय सिंह के मंत्रिमंडल के सदस्य रह चुके हैं। छत्तीसगढ के गठन के बाद भी वे दिग्विजय से जुडे़ रहे।
पार्टी में तीनो अहम पदों पर इस समय अजीत जोगी विरोधियों का कब्जा हो गया है, जोगी गुट इसे अपने को किनारे करने की रणनीति के रूप में देख रहा है।
नक्सल हमले में मारे गए नेताओं कार्यकर्ताओं को श्रद्वांजलि देने के लिए दिग्विजय ने राज्य का चार दिवसीय दौरा किया।
उन्होंने इस दौरे में श्रद्वांजलि के साथ ही जिस तरह से जोगी विरोधियों से चुन-चुन कर मुलाकात की उसकी प्रतिक्रिया जोगी के दिग्विजय के सार्वजनिक विरोध से हुई।
जोगी ने दिग्विजय की मौजूदगी में उनके गृह नगर राघोगढ़ का नाम लिए बगैर उसे इंगित कहा, 'भूल जाओं भले कोई भी बुरा माने लेकिन मैं साफ कह देना चाहता हूं कि प्रतापगढ़, फतेहगढ़ या किसी गढ़ से आकर कोई नेता छत्तीसगढ़ को नही जगा सकता।'
जोगी की इस टिप्पणी का गूंज दिल्ली तक सुनाई पड़ी। कार्यवाहक अध्यक्ष महंत ने दिल्ली में इसके बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की।
महंत ने मुलाकात के बाद जोगी के कथन पर यह कह कर पानी डालने की कोशिश की कि उनकी टिप्पणी दिग्विजय सिंह की बजाय रमन सिंह पर थी जिनका उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ से जुड़ाव है।
जोगी की रणनीति
जोगी फिलहाल खुलकर नहीं बोल रहे है पर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि वह चुप नहीं बैठने वाले हैं। उन्होंने इस बारे में अपनी रणनीति पर काम भी शुरू कर दिया है।
जोगी की राजनीति का मुख्य आधार सामाजिक समीकरणों का रहा है और इसी के सहारे अपनी रणनीति को आगे बढाने की उनकी योजना है।
दरअसल राज्य में कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग रहा है। पिछले 10 वर्षो में यह वोट बैंक उससे दूर होता गया है।
राज्य में 2003 में पहले विधानसभा चुनाव में दलितों के लिए आरक्षित केवल एक सीट को छोड़कर शेष सभी पर कांग्रेस ने कब्जा किया था, वहीं 2008 में केवल एक आरक्षित सीट पर उसका उम्मीदवार जीत सका।
दलितों का जहां इस दौरान उससे मोहभंग हुआ वहां आदिवासी बाहुल बस्तर की 12 में 10 सीटों पर उसे 2003 में और 2008 में 11 सीटों पर शिकस्त का सामना करना पडा़। आदिवासियों के लिए आरक्षित अधिकांश सीटों पर भाजपा ने कब्जा जमाया।