धान खरीदी के अंतिम चरण में किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए रकबा समर्पण का दबाव झेलना पड़ रहा है। टोकन कटने के बाद भी कई किसान अपनी निर्धारित मात्रा के अनुसार पूरा धान नहीं बेच पा रहे हैं, जिससे उनमें नाराजगी है। इस समस्या के कारण किसानों को अपनी मेहनत की कमाई से वंचित रहना पड़ रहा है।
बोडरा पूरी सोसायटी के एक किसान, सूरज दुबे, ने 210 क्विंटल धान बेचने के लिए ऑनलाइन टोकन लिया था। जब वह धान बेचने पहुंचा, तो उससे रकबा समर्पण के नाम पर 20 क्विंटल धान कम खरीदा गया। बचे हुए धान को बेचने के लिए अब उसका टोकन भी नहीं काटा जा रहा है। किसान हताश है कि वह इस अतिरिक्त धान का क्या करेगा।
किसानों का कहना है कि फसल बोने से पहले गिदावरी के सर्वे के आधार पर एग्रिस्टेक पोर्टल में उनका पंजीयन किया गया था और उसी के अनुसार धान का टोकन काटा गया था। ऐसे में, बाद में भौतिक सत्यापन के नाम पर रकबा समर्पण का दबाव बनाना अनुचित है।
किसानों के अनुसार, चुनाव के समय भाजपा ने प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदने का वादा किया था, लेकिन अब धान कम खरीदने के लिए नए नियम बनाए जा रहे हैं। अधिकारियों द्वारा किसानों को सही जानकारी नहीं दी जा रही है। कुछ किसानों से खेत रेगहा में देने के नाम पर रकबा समर्पण करवाया जा रहा है, तो कुछ से धान दूसरे स्थान पर रखने के बहाने।
बोडरा पूरी के एक किसान के रकबा समर्पण के मामले में जब महिला नोडल अधिकारी से चर्चा की गई, तो उन्होंने कहा कि किसान की सहमति से रकबा समर्पण कराया जा रहा है। उन्होंने बताया कि जितने किसानों ने रकबा समर्पित किया है, उसकी सूची एसडीएम को भेजी जाएगी।
जब यह सवाल पूछा गया कि क्या रकबा समर्पण करने वाले किसानों का धान बाद में खरीदा जाएगा, तो नोडल अधिकारी ने कहा कि इसका निर्णय शासन स्तर पर होगा। फिलहाल, समर्पित रकबे के धान की बाद में खरीदी को लेकर कोई आदेश नहीं आया है, जिससे किसानों की चिंता और बढ़ गई है। इस स्थिति के कारण किसानों में भारी रोष है और वे अपनी उपज बेचने के लिए सरकारी नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं।