स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय
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छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय ने अपने पुराने विद्यार्थियों को बड़ी राहत देते हुए एन-4 (एन माइनस फोर) नियम को पूरी तरह समाप्त करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद की बैठक में लिए गए इस फैसले से इंजीनियरिंग, फार्मेसी सहित तमाम तकनीकी पाठ्यक्रमों के पुराने विद्यार्थियों को ईयर बैक और डिटेन होने की समस्या से राहत मिलेगी। इस बड़े निर्णय के बाद हजारों विद्यार्थियों का साल बर्बाद नहीं होगा और उनका शैक्षणिक भविष्य सुरक्षित रहेगा।
सीएसवीटीयू के कुलपति डॉ. अरुण अरोरा ने बताया कि एआईसीटीई के पाठ्यक्रम से पढ़ाई कर रहे पुराने छात्रों के लिए एन-4 समाप्त कर दिया गया है, जिससे अब उनका ईयर बैक नहीं लगेगा और आगे बढ़ने का रास्ता नहीं रुकेगा।
नियम समाप्त करने के मुख्य कारण
विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा यह फैसला केंद्र सरकार की आगामी नीतियों को ध्यान में रखकर लिया गया है। दरअसल केंद्र सरकार ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) को बंद करके एक एकल नियामक एजेंसी तैयार करने जा रही है। संभावित रूप से आगामी एक से दो वर्षों में यह नई व्यवस्था लागू हो सकती है। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय में एआईसीटीई के पुराने नियमों के तहत अध्ययनरत छात्रों की नियामक व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका थी। इसके साथ ही पुरानी नियामक व्यवस्था और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अलग-अलग नियमों के कारण पूरी व्यवस्था काफी बोझिल और जटिल हो रही थी। इसी वजह से कार्यपरिषद ने पुराने विद्यार्थियों को एन-4 नियम से राहत देने का निर्णय लिया। हालांकि यह नियम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत प्रवेश लेने वाले नए विद्यार्थियों पर लागू नहीं होगा और उनके लिए व्यवस्था यथावत बनी रहेगी।
वर्ष 2005 से 2015 तक का घटनाक्रम
विश्वविद्यालय में एन-4 नियम को लेकर लंबे समय से असमंजस की स्थिति बनी हुई थी। पूर्व कैबिनेट मंत्री प्रेमप्रकाश पांडेय ने एन-4 नियम की पैरवी करते हुए कहा था कि विश्वविद्यालय द्वारा खराब इंजीनियर बनाने के बजाय कुछ ही काबिल इंजीनियर बनाए जाएं तो ज्यादा बेहतर होगा। उनके इस तर्क के बाद ही कार्यपरिषद की बैठक में सीएसवीटीयू ने एन-4 नियम लागू किया था। तकनीकी विश्वविद्यालय में एन-4 नियम वर्ष 2005 से 2011 तक अपनाया गया। इसके बाद नियमों को लचीला बनाने के उद्देश्य से वर्ष 2011 में संशोधन किया गया, जिसके तहत प्रथम सेमेस्टर में कम से कम तीन विषयों में पास होना अनिवार्य कर दिया गया। शेष विषयों में बैक आने पर भी छात्रों को आगे बढ़ने की अनुमति मिलती थी और उन्हें डिटेन नहीं किया जाता था। इस कारण पांचवें सेमेस्टर तक पहुंचते-पहुंचते छात्रों के कई विषय बैकलॉग में जमा हो जाते थे। शैक्षणिक स्तर में सुधार और इंजीनियरिंग की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए विश्वविद्यालय ने वर्ष 2015 में एन-4 नियम को दोबारा लागू कर दिया था।
एन-4 व्यवस्था की प्रक्रिया और प्रभाव
एन-4 नियम की शर्तों के अनुसार पांचवें सेमेस्टर में प्रवेश पाने के लिए छात्र का प्रथम सेमेस्टर पूरी तरह ऑल क्लियर होना अनिवार्य था। एक भी विषय में बैक होने पर उसे डिटेन कर दिया जाता था और एक साल पीछे कर दिया जाता था। यही प्रक्रिया छठवें सेमेस्टर में भी लागू होती थी, जहां जब तक दूसरे सेमेस्टर के सभी विषय पास नहीं होते थे, तब तक छठवें सेमेस्टर में प्रवेश नहीं मिलता था। छात्र को अपने जूनियर साथियों के साथ दोबारा पढ़ाई करनी पड़ती थी। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार इस नियम से छात्र शुरुआती दो वर्षों में कड़ी मेहनत करके पढ़ते थे ताकि तीसरे साल में प्रवेश मिल सके और उनका परिणाम भी बेहतर रहता था। हालांकि डिटेन विद्यार्थियों की संख्या में लगातार हो रहे इजाफे को देखते हुए विश्वविद्यालय ने अब इस नियम को शिथिल कर दिया है।