छत्तीसगढ़ में एक पखवाड़े पूर्व हुई भारी बारिश से फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है। फसलें पूरी तरह से तबाह हो चुकी हैं। धान की फसलें आंधी-अंधड़ से पलट गई हैं। अनाज, सब्जी, फूल-फूल समेत कई फसलों पर मौसम की दोहरी मार पड़ी है। भारी बारिश से फसलों में पानी लगने से जहां सब कुछ बर्बाद हो गया है। वहीं अब फसलों में कीट-पतंगों के लगने से वह पूरी तरह से खराब हो रही है। इस तरह से देखा जाये तो किसानों पर मौसम की दोहरी मार पड़ी है। पहले बारिश फिर और अब कीट-पतंगें फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
किसान पहले भारी बारिश से परेशान हुआ और अब दवा करा-कराकर कीट-पतंगों से परेशान है। नदी के आस-पास और दूरदराज की फसलों में बारिश का पानी पहुंचने से फसलें सड़ने लगीं। कई जगह फसलें पलट गई। इससे किसानों की अनाज, फल-फूल समेत कई फसलें चौपट हो गई हैं। भारी बारिश का असर अब किसानों की फसलों पर साफ दिखाई दे रहा है। भारी बारिश और बाढ़ की वजह से फल-फूल, अनाज के खेत और सब्जियों को भारी नुकसान पहुंचा है।
जमकर हुई थी मूसलाधार बारिश
24 से 27 सितंबर के बीच रायपुर समेत छत्तीसगढ़ के कई जिलों में जमकर मूसलाधार बारिश हुई। इस दौरान बस्तर संभाग के करीब छह से ज्यादा जिले टापू बन गए थे। इस माह यानी अक्टूबर में मानसून की विदाई हो गई है, लेकिन मानसून ने अपने पीछे भयंकर तबाही छोड़ दी है, जिसकी पीड़ा किसान भूला नहीं पा रहे हैं। उनकी आंखों के सामने उनकी गाढ़ी कमाई बारिश में तबाह हो गई। रही कसर कीट-पतंगों ने पूरी कर दी है। रिटर्न मानसून ने फसलों को काफी नकुसान पहुंचाया है।
खेतों में करीब ढाई फीट तक पानी भर जाने से फल-फूल, सब्जी और दूसरी फसलों में सड़न और कीड़े लगना शुरू हो गया है। जरूरत से ज्यादा पानी होने से फसलों में मौसमी बीमारियां लग गई है। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, मौसम में आए बदलाव और तापमान में परिवर्तन से फसलों में बीमारियां ज्यादा लगती हैं। इसका सबसे ज्यादा असल फल-फूल और सब्जियों को पहुंचा है। ऐसे में किसानों के पास केवल एक ही विकल्प रह गया है कि वो कीटनाशक दवाइयों का उपयोग कर अपनी फसल को बचा सकते हैं। पहले बारिश फिर मौसमी बीमारियां और अब शुष्क मौसम होने से फसलों को काफी नुकसान पहुंचा है।
'बैक्टीरियल बीमारियां ज्यादा'
इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि नर्सरी अवस्था में ऐसी बैक्टीरियल बीमारियां होती हैं, जिन पर दवाइयों का प्रयोग कर किसान फसल को खराब होने से बचा सकते हैं। 48 घंटे तक हुई बारिश की वजह से खेत और नर्सरी में जलभराव हो गया, जिससे काफी नुकसान पहुंचा। प्रदेश में चार प्रकार की मिट्टी हैं। जिसमें मटासी, भाठा, डोडसा और कन्हार मिट्टी है। ऐसी स्थिति में ताल-तलैया और नहरों से जुड़े जितने भी हमारे डैम हैं, वो चाहे तांदुला डैम हो या धमतरी का गंगरेल डैम। जब गंगरेल के 14 गेट खोले गए तो इसका पानी नहरों से होते हुए खेतों में पहुंच गया। ऐसे में जलभराव होने से सब्जियों को काफी नुकसान पहुंचा है। खारुन, शिवनाथ, अरपा और महानदी के कछार में जो वेजिटेबल्स लगाए जाते हैं उन पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है।
ये कीडे़ पहुंचाते हैं नुकसान
फसलों में चूसक कीट यानी काटने वाला और परभक्षी कीट ये सभी एक साथ अपना प्रजनन करते हैं, जिससे कीटों का संक्रमण होता है। धान वर्गीय, दाल वर्गीय और तिलहन वर्गीय फसलों में हमारा प्रदेश अग्रणी रहा है। टिड्डे(कीड़े) के मल्टीप्लिकेशन के लिए यह एक बहुत ही उपयुक्त मौसम होता है। टिड्डा यहीं पर सक्रिय होता है। हरा माहू, भूरा माहू जैसे कीड़े तेजी से आक्रमण करते हैं और फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।
सोयाबीन में भी भींग का संक्रमण होता है। मूंग, उड़द जैसी दाल-तिलहन की फसलों में भी इसी तरह के कीड़े लगते हैं।