गांव के इसी मैदान को ग्रामीणों ने खुले में शौच का अड्डा बना लिया है
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हर सुबह एसआर तेजस्वी उनके साथी और स्कूल के छात्र अमदी के गर्वनमेंट हायर स्कूल में प्रवेश करने से पहले अपनी नाक पर कपड़ा रख लेते हैं, वो ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि स्कूल के बराबर के खेल मैदान को आसपास रहने वाले लोगों ने पेशाब करने की जगह बना लिया है।
आलम ये है कि पेशाब और शौच करने के कारण मैदान की घास भी बदबूदार हो चुकी है। इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार तेजस्वी इसी स्कूल में प्रधानाचार्य हैं।
खास बात ये है कि इस महीने की शुरूआत में ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने धमतरी और मुंगेली को छत्तीसगढ़ का पहला खुले में शौच मुक्त जिलों घोषित किया था। सरकार ने खुले में शौच मुक्त जिले की जो परिभाषा तय की है उसके अनुसार खुले में मल फैला न हो और सभी लोग शौच के लिए शौचालय का इस्तेमाल करते हों। इसके अलावा मल के निस्तारण के लिए उचित व्यवस्था हो।
वहीं अखबार की ओर से इस संबंध में धमतरी जिले में जो जांच पड़ताल की गई उसमें कुछ और ही बातें सामने आईं। मगरलोड ब्लॉक के मोहदी गांव में टीम साठ साल की मुन बाई के एक कमरे के घर में पहुंची। शाम सात बजे मनु बाई नीले रंग की प्लास्टिक की बोतल लेकर शौच के लिए जा रही थीं।
जिले के कई गांव के लोग अभी भी खुले में जाते हैं शौच
उनसे पूछा गया तो बोलीं- हर शाम मुझे ये पानी की बोतल और छड़ी लेकर मैदान में शौच के लिए जाना पड़ता है। उन्होंने बताया कि मेरे घर में कभी शौचालय नहीं रहा और न ही कोई अधिकारी कभी मेरे यहां आया।
गांव में 300 से ज्यादा मकान हैं, एक अनुमानित आंकड़े के अनुसार 100 से ज्यादा घरों में शौचालय की व्यवस्था नहीं है। जहां शौचालय हैं भी वो बहुत खराब हालत में हैं। वहां पानी का कनेक्शन नहीं है तो कहीं सीवेज पाइप काफी दूर हैं। वहीं यादवपारा गांव में महिलाओं का एक समूह शौच के लिए मैदान की तरफ जा रहा था। उनसे पूछा गया तो जवाब मिला- यह खतरनाक और असहज करने वाला है इसलिए हम लोग एक साथ निकलते हैं।
वहीं सड़क से दस किलोमीटर दूर सीतानंद सेंचुरी के बौरगांव में कुल 28 घर हैं जिनमें से 107 लोग रहते हैं। गांव के लोग बताते हैं उन्होंने एक महीने पहले स्वच्छ भारत अभियान के बारे में सुना था। उसके बाद बहुत तेजी से शौचालय बनवाए गए।
स्थानीय अखबारों ने उस समय इनके बारे में खबरें छापी थीं कि इनमें कोई काम नहीं कर रहा है, जिसके बाद अधिकारियों ने यहां दौरा किया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। नतीजा ये रहा कि आज कोई भी ग्रामीण इनका उपयोग नहीं कर पा रहा है।
अधिकारियों की टीम ने दूसरे शौचालय के बाहर खड़े कर खिंचवाया फोटो
गांव के ही संतलाल के घर पर 20 दिन पहले शौचालय का निर्माण किया गया था। अखबार की टीम वहां पहुंची तो देखा शौचालय के छेद में सूखा सीमेंट भरा है। वो कहते हैं कि ज्यादा बड़ी समस्या तो बाहर शौचालय के पाइप टैंक से तीन फिट दूर हैं। टैंक इतना छोटा है कि अगर हमने एक महीना शौचालय का इस्तेमाल किया तो इसका मल बाहर आ जाएगा। ऐसे में हम कैसे इसका इस्तेमाल करें।
वहीं गांव के युवराज साहू बताते हैं कि पिछले साल नगर पंचायत के अधिकारी उनके एक कमरे के मकान पर आए थे और कहा कि यहां शौचालय बनना असंभव है। इसके बाद वह मेरे पास आए और मुझसे एक शौचालय के बाहर खड़े होकर फोटो खिंचवाने के लिए कहा जो मेरे घर से काफी दूर था।
शाहू बताते हैं कि जब मैंने अखबार में अपना फोटो देखा तो मैं अधिकारियों के पास पहुंचा। वहां जाकर पता चला कि उसके घर में शौचालय निर्माण के लिए 12000 रुपये दिए जा चुके हैं। वो हताशा से कहते हैं कि ऐसे यहां बहुत सारे केस हैं। गांव में कुछ शौचालय तो ऐसे हैं जिनमें किसानों ने फसल भर रखी है। ताकि वो जल्दी से सूख जाएं।