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सेवानिवृत्त कर्मचारियों पर कार्रवाई के लिए राज्यपाल की मंजूरी अनिवार्य: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

Wed, 07 Oct 2026 04:06 PM IST
अमन कोशले अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर

सार

उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ सेवानिवृत्ति के बाद शुरू होने वाली विभागीय कार्रवाई को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ सेवानिवृत्ति के बाद शुरू होने वाली विभागीय कार्रवाई को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय की एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस बीडी गुरु ने स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के तहत किसी भी सेवानिवृत्त कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलाने के लिए राज्यपाल की पूर्वानुमति लेना अनिवार्य है।
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अदालत ने माना कि केवल मुख्यमंत्री की स्वीकृति के आधार पर ऐसी कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं हो सकती। इस निर्णय के साथ ही उच्च न्यायालय ने पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता रियाजुल बारी के विरुद्ध जारी आरोप पत्र और उसके आधार पर संचालित पूरी विभागीय कार्रवाई को निरस्त कर दिया है।

पेंशन नियमों की अनिवार्यता पर उच्च न्यायालय की स्पष्ट टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायाधीश बीडी गुरु की पीठ ने छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियमों के वैधानिक प्रावधानों का गहराई से परीक्षण किया। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि पेंशन नियमों में स्पष्ट रूप से राज्यपाल की मंजूरी का वैधानिक प्रावधान मौजूद है। राज्य सरकार ऐसा कोई भी संशोधित कानून या वैधानिक प्रावधान प्रस्तुत करने में विफल रही, जिससे यह सिद्ध हो सके कि नियम में राज्यपाल के स्थान पर मुख्यमंत्री की स्वीकृति को मान्य किया गया है। अदालत ने कहा कि कोई परिपत्र या कार्यालयीन व्यवस्था मूल वैधानिक नियम को नहीं बदल सकती। जब कानून किसी विशेष प्रक्रिया के निष्पादन के लिए एक निश्चित तरीका तय करता है, तो शासन को उसी वैधानिक प्रक्रिया का अक्षरशः पालन करना अनिवार्य होता है।
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याचिकाकर्ता का सेवा इतिहास और अनियमितता के आरोप
मामले के तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता रियाजुल बारी ग्रामीण अभियांत्रिकी सेवा विभाग में चार दशक से अधिक समय तक विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे। वे 30 जून, 2023 को मुख्य अभियंता के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति से ठीक पहले 22 मई, 2023 को संबंधित विभाग ने उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र भी जारी किया था। इसमें बताया गया था कि उनके खिलाफ कोई विभागीय जांच या प्रतिकूल मामला लंबित नहीं है। सेवानिवृत्ति के बाद राज्य सरकार ने उन्हें छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास अभिकरण में निर्माण विभाग के मुख्य अभियंता के पद पर संविदा के आधार पर नियुक्त किया। इसी दौरान प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़कों के रखरखाव के लिए निर्धारित राशि में कथित वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया। विभाग ने इस मामले में सेवानिवृत्ति के लगभग तीन वर्ष बाद 21 अप्रैल, 2026 को आरोप पत्र जारी किया, जो याचिकाकर्ता को 9 मई, 2026 को प्राप्त हुआ।

प्रशासनिक आदेश बनाम वैधानिक प्रक्रिया पर अधिवक्ताओं के तर्क
इस आरोप पत्र को चुनौती देते हुए रियाजुल बारी ने अपने वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क प्रस्तुत किया कि पेंशन नियम, 1976 के नियम 9 के अनुसार सेवानिवृत्त कर्मचारी के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करने से पूर्व राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक है, जिसका इस मामले में उल्लंघन हुआ। इसके जवाब में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि 2 मार्च, 2017 के एक शासकीय परिपत्र के अनुसार ऐसे मामलों में समन्वय विभाग के माध्यम से मुख्यमंत्री की मंजूरी ली जाती है। राज्य सरकार का कहना था कि मुख्यमंत्री ने 25 फरवरी, 2026 को इस कार्रवाई के लिए स्वीकृति दी थी, जो विभागीय कार्रवाई हेतु पर्याप्त है। अदालत ने राज्य सरकार के इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए 21 अप्रैल, 2026 के आरोप पत्र और पूरी विभागीय कार्रवाई को रद्द कर दिया। हालांकि, उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि यदि सरकार कानून के अनुसार पेंशन नियमों में निर्धारित जरूरी प्रक्रिया पूरी करती है, तो वह नए सिरे से कार्रवाई कर सकती है।
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