छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता के खिलाफ जारी आरोप पत्र और विभागीय कार्रवाई को निरस्त कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राज्यपाल की पूर्व मंजूरी के बिना सरकार किसी सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं कर सकती।
यह मामला प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में स्वीकृत धनराशि के कथित गलत इस्तेमाल और अनियमित भुगतान से जुड़ा है। उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ता की अर्जी स्वीकार करते हुए शासन द्वारा जारी आरोप पत्र को पूरी तरह खारिज कर दिया।
मुख्यमंत्री के अनुमोदन पर हाईकोर्ट का मत
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्दीकी ने अदालत में दलील दी कि सेवानिवृत्त कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई छत्तीसगढ़ सिविल सेवा पेंशन नियम, 1976 के नियम 9 के अनुसार ही चल सकती है। नियम 9 के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई शुरू करने के लिए राज्यपाल की मंजूरी जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल मुख्यमंत्री के अनुमोदन के आधार पर शासन ऐसी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ा सकता।
राज्य सरकार अदालत में ऐसा कोई संशोधन पेश नहीं कर सकी, जिससे साबित हो कि नियमों में राज्यपाल की जगह मुख्यमंत्री की मंजूरी का प्रावधान शामिल कर लिया गया है। अदालत ने माना कि जब तक कानून में संशोधन नहीं होता, तब तक किसी परिपत्र या मुख्यमंत्री की सहमति से नियमों में तय राज्यपाल की मंजूरी की शर्त खत्म नहीं की जा सकती।
सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के फैसलों का संदर्भ
याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने अपने तर्कों के समर्थन में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का भी संदर्भ दिया। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के मीरा साहनी बनाम दिल्ली मामले के फैसले का उल्लेख किया। इसके अलावा उन्होंने हाईकोर्ट की रिट अपील संख्या 266/2025 में डिवीजन बेंच के फैसले तथा रिट याचिका संख्या 3981/2004 में पारित आदेश को अदालत के समक्ष रखा। इन सभी न्यायिक फैसलों के अनुसार, पेंशन नियम 1976 के नियम 9 में तय जरूरी शर्तों का पालन किए बिना सेवानिवृत्त लोक सेवक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं हो सकती।
पेंशन नियमों के तहत मंजूरी का विवाद
छत्तीसगढ़ ग्रामीण सड़क विकास एजेंसी से मुख्य अभियंता के पद से रियाजुल बारी 30 जून, 2023 को सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के समय संबंधित विभाग ने उन्हें अनापत्ति प्रमाणपत्र दिया था, जिसमें दर्ज था कि उनके खिलाफ कोई जांच लंबित नहीं है। इसके बाद भी सेवानिवृत्ति के तीन साल बाद 21 अप्रैल को पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग ने उनके खिलाफ आरोप पत्र जारी कर दिया। विभाग ने आरोप पत्र में अतिरिक्त निष्पादन सुरक्षा निधि, सुरक्षा निधि, निष्पादन गारंटी, रॉयल्टी तथा जीएसटी की राशि के गलत इस्तेमाल और अनियमित भुगतान की बात कही।
शासन का दावा था कि यह कृत्य छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के प्रावधानों के खिलाफ है। याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए थे, जिन्हें आधार बनाकर विभाग ने जांच शुरू की थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने विभागीय आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका लगाई।