छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 में नक्सल प्रभावित बस्तर और राजनांदगांव क्षेत्र की 18 सीटों पर राजनीतिक दलों ने अपनी अपनी जीत के दावे तो किए हैं, लेकिन लगातार बदलाव की साक्षी रही इन सीटों की जनता इस बार किस करवट बैठेगी यह आने वाला वक्त ही बताएगा। इन सीटों के महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमन सिंह का चुनावी भविष्य दांव पर है। उनके सामने दिवंगत पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला हैं।
छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित दक्षिण क्षेत्र बस्तर के सात जिलों बस्तर, कोडागांव, कांकेर, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा तथा राजनांदगांव जिले की कुल 18 विधानसभा सीटों पर कभी कांग्रेस तो कभी भाजपा प्रत्याशी विजयी होते रहे हैं। लेकिन एक दो सीटें दोनो पार्टियों का परंपरागत गढ़ कही जा सकती हैं। जैसे डोंगरगढ़, नारायणपुर और जगदलपुर में भाजपा कभी नहीं हारी। इसी तरह कोंटा सीट से कांग्रेस कभी नहीं हारी है।
2000 राज्य के गठन के बाद चूंकि मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी इसलिए अगले तीन वर्ष के लिए यहां भी अजीत जोगी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार रही। 2003 में पहले विधानसभा चुनाव में भाजपा विजयी रही। इन नक्सल प्रभावित 18 सीटों में से 13 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत हासिल की और कांग्रेस को शेष पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा। एनसीपी नौ सीटों पर तीसरे स्थान पर रही और इसने स्वाभाविक रूप से कांग्रेस के वोट काटे।
साल 2008 के विधानसभा चुनाव में 18 सीटों में से भारतीय जनता पार्टी को 15 सीटें मिलीं और कांग्रेस तीन सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई और छह फीसदी से ज्यादा वोट हासिल किए। बसपा चार सीटों पर और भाकपा तीन सीटों पर तीसरे स्थान पर रही। भाकपा दंतेवाड़ा में दूसरे स्थान पर रही और भाजपा को तीसरे स्थान पर धकेल दिया।