छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क निकालने की रावघाट परियोजना पिछले 30 साल से फ़ाइलों में फंसी हुई है। इस बार लौह अयस्क आपूर्ति के लिए बनने वाली रेलवे लाइन फंस गई है क्योंकि उसके लिए पेड़ काटने के लिए कोई आगे नहीं आ रहा। इस परियोजना का माओवादी और स्थानीय आदिवासी विरोध कर रहे हैं और सामाजिक कार्यकर्ता भी। आखिर इस विरोध की वजह क्या है और कितनी वाजिब है यह?
छत्तीसगढ़ में लौह अयस्क निकालने की रावघाट परियोजना पर संकट के बादल छंटने का नाम नहीं ले रहे हैं। ताज़ा संकट इस परियोजना के लिए बनने वाली रेल लाइन का है, जिसके रास्ते में आ रहे पेड़ों की कटाई के लिए कोई सामने नहीं आ रहा है। इस रेल परियोजना के लिए लगभग 3 लाख पेड़ काटे जाने हैं। पेड़ों की कटाई के लिए पिछले साल भर में तीन बार निविदा निकाली जा चुकी है।
परियोजना का विरोध कर रहे माओवादियों का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के नाम पर सरकार रावघाट के लौह अयस्क को निजी कंपनियों को सौंपना चाहती है। सामाजिक कार्यकर्ता इस परियोजना में क़ानून की अनदेखी का भी आरोप लगाते रहे हैं। इसके अलावा इस परियोजना से प्रभावित होने वाले आदिवासियों के जीवन यापन को लेकर भी कई सवाल उठते रहे हैं। यही कारण है कि पिछले 30 साल से यह परियोजना फाइलों में घिसटती हुई आगे बढ़ रही है।
भिलाई इस्पात संयंत्र के लिए अभी लौह अयस्क की आपूर्ति पड़ोस की दल्ली राजहरा की खदानों से होती है। लेकिन दल्ली राजहरा की खदानों में अब केवल पांच साल के उपयोग के लायक ही लौह अयस्क बचा है। भिलाई इस्पात संयंत्र प्रबंधन का कहना है कि अगर रावघाट से लौह अयस्क के खनन का काम शुरू नहीं हुआ तो 31 लाख 53 हजार टन वार्षिक उत्पादन वाले भिलाई संयंत्र में तालाबंदी की नौबत आ सकती है।
रावघाट
उत्तर बस्तर के कांकेर और नारायणपुर ज़िले में स्थित रावघाट की पहाड़ियों में लौह अयस्क के छह ब्लॉक हैं, जिनमें 712।48 मिलियन टन लौह अयस्क होने का अनुमान है। भारत सरकार के उपक्रम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड यानी सेल के भिलाई इस्पात संयंत्र ने पहली बार 30 अगस्त, 1983 को रावघाट की लौह अयस्क की खदानों के लिए भारत सरकार को आवेदन दिया था। लेकिन अलग-अलग कारणों से यह आवेदन रद्द होता रहा।
इस बीच छत्तीसगढ़ सरकार ने 9 जून, 2003 को 456 मिलियन टन क्षमता वाले एफ ब्लॉक के कोरेगांव की खदान को निजी कंपनी को देने की मंजूरी दे दी। हालांकि बाद में 4 जून, 2009 को भारत सरकार ने भिलाई इस्पात संयंत्र को ही पूरे एफ ब्लॉक में खनन का अधिकार सौंप दिया। उस समय भिलाई इस्पात संयंत्र ने 2012 से लौह अयस्क की ढुलाई की योजना बनाई थी। लेकिन तब से अब तक खुदाई की दिशा में काम आगे नहीं बढ़ पाया है।
रेल लाइन
लौह अयस्क की ढुलाई के लिये बनने वाली 235 किलोमीटर लंबी रेल लाइन ही अभी अटकी पड़ी है। पहले चरण में 259 हेक्टेयर वन भूमि में पेड़ों की कटाई की जानी है। इनमें कांकेर वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई बार-बार टल रही है। कांकेर के मुख्य वन संरक्षक अरुण कुमार पांडेय का कहना है, "पेड़ों की कटाई का काम जल्दी शुरू होने की उम्मीद है। अभी तक कटाई का काम टलने के पीछे कई कारण रहे हैं। लेकिन मुझे नहीं लगता कि अब कोई परेशानी है।"
योजना को लेकर एक बड़ी चुनौती तो माओवादी हैं। हालांकि माओवादी मानते हैं कि यह जनता का संघर्ष है और जनता ही विरोध कर रही है।
कुछ समय पहले बीबीसी को भेजे एक साक्षात्कार में सीपीआई माओवादी की दण्डकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के सचिव रामन्ना का यह बयान ग़ौरतलब है, "रावघाट परियोजना का विरोध जनता ने 1990 के दशक की शुरुआत में ही प्रारंभ किया था। हमारी पार्टी के उस इलाक़े में पहुंचने से भी पहले से। बाद में हमारी पार्टी ने इस संघर्ष का नेतृत्व किया।"
"जनता का विरोध जायज़ है क्योंकि इस परियोजना से यहां की ज़मीनों, जंगलों और नदियों को, कुल मिलाकर यहां के समूचे जनजीवन को भारी ख़तरा है।"
इस बयान में रामन्ना कहते हैं, "हमारा मानना है कि भिलाई स्टील प्लांट का कच्चा माल संकट महज़ एक बहाना है। यहां पर टाटा, नेको जैसी बड़ी कॉर्पोरट कंपनियों की लूटखसोट का खेल शुरू होने वाला है। सार्वजनिक क्षेत्र कंपनी सेल इसका रास्ता साफ करने वाले दलाल का काम कर रही है।"
ज़ाहिर है, माओवादियों का भय पेड़ों की कटाई में बड़ा बाधक है। लेकिन कांकेर ज़िले के पुलिस अधीक्षक राजेंद्र नारायण दास सुरक्षा व्यवस्था को एकदम दुरुस्त बताते हैं। उनका कहना है कि पेड़ों की कटाई न होने के पीछे दूसरे कारण हो सकते हैं। दूसरी ओर सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि रावघाट परियोजना के लिए सारे क़ानून किनारे कर दिए गए हैं। इस खनन परियोजना से प्रभावित होने वाले 35 गांवों के आदिवासियों के जीवन यापन और वन अधिकार कानून से लेकर चार टाइगर प्रोजेक्ट से घिरे हुए रावघाट को लेकर कई सवाल हैं।
छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु, वन भैंसों, की देश भर में कुल बची हुई 2900 की संख्या में से कुछ की शरणस्थली रावघाट और उससे लगा हुआ इलाक़ा रहा है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला कहते हैं, "आदिवासियों के अधिकार के किसी भी क़ानून का पालन रावघाट परियोजना में नहीं हो रहा है। न उनसे सहमति ली गई है और न ही उनके विस्थापन की दिशा में कोई प्रयास। जब जंगल नहीं रहेगा तो आदिवासियों के सामने आजीविका सबसे बड़ा संकट है।"
अधर में परियोजनाएं
4 जून, 2005 को टाटा स्टील कंपनी ने बस्तर के लोहण्डीगुड़ा में इस्पात संयंत्र लगाने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के साथ एक एमओयू किया था। 10 हज़ार करोड़ रुपये की लागत से 5 मिलियन टन की वार्षिक उत्पादन क्षमता वाले इस इस्पात संयंत्र के लिए 10 गांवों की ज़मीन का अधिग्रहण भी पूरी तरह नहीं हो पाया है। सरकार और टाटा स्टील ने करोड़ों रुपये खर्च करके सारे उपाये कर लिए लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया।
इसी तरह 5 जुलाई 2005 को छत्तीसगढ़ सरकार ने एस्सार ग्रुप के साथ दंतेवाड़ा के धुरली और भांसी में 3।2 मिलीयन टन का इस्पात संयंत्र लगाने के लिए एमओयू किया था। ज़मीन अधिग्रहण का काम ही नहीं हो पाया। जगदलपुर से लगभग 40 किलोमीटर दूर नगरनार में भी राष्ट्रीय खनिज विकास निगम ने 90 के दशक में इस्पात संयंत्र लगाने की योजना पर काम शुरु किया था। लेकिन अब कहीं जा कर इस्पात संयंत्र बनाने के काम ने ज़ोर पकड़ा है। हालांकि इस निर्माणाधीन संयंत्र को लेकर विरोध जारी है।