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छत्तीसगढः दोधारी तलवार है यहां खबर लिखना

Tue, 18 Feb 2014 01:48 PM IST
आलोक प्रकाश पुतुल/रायपुर से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
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2008 में छत्तीसगढ में नक्सलियों के खिलाफ सरकार और सलवा जुडूम का अभियान अपने चरम पर था। मैं उस समय एक फेलोशीप के तहत नक्सल आंदोलन और औद्योगिकीकरण के बीच के रिश्ते को समझने के लिए अध्ययन कर रहा था।
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एक सरकारी विज्ञप्ति में खबर मिली कि सलवा जुडूम के कैंप में रहने वाले तीन लोगों को नक्सलियों ने मार डाला है। मैंने पडताल की और मरने वाले तीनों लोगों के परिजनों, उनकी पत्नियों और जिंदा बच गए लोगों से मिल कर यह सच्चाई सामने लाया कि आदिवासियों को नक्सलियों ने नहीं, पुलिस वालों ने ही मारा था। मेरी खबर रायपुर के एक दैनिक अखबार में प्रमुखता से छपी।

मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा और इस मामले में पीडितों को मुआवजा देने के निर्देश भी दिए गए।

लेकिन खबर छपने के कोई सप्ताह भर बाद मैं जब एक अधिकारी से बातचीत के लिए पुलिस मुख्यालय पहुंचा तो पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मिलते ही पूछा, “आप नक्सलियों की मदद क्यों कर रहे हैं?”
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मैं इस सवाल से भौंचक रह गया। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि मैंने केवल अपने पत्रकार होने का धर्म निभाया है और सच्चाई सामने लाई है। लेकिन वह चाहते थे कि पुलिस की ऐसी गडबडियां सामने न लाई जाएं। उनके अनुसार इससे पुलिस का मनोबल गिरता है।

200 से ज्यादा अखबार

छत्तीसगढ में नक्सलियों और पुलिस को लेकर जब आप कोई तथ्यात्मक खबर लिखते हैं तो आपको दोनों का शिकार होना पडता है।

भारत में पत्रकारिता के हालात पर 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' की ताजा रिपोर्ट को पढते हुए ऐसे कई किस्से याद आ गए।

छत्तीसगढ में नक्सलियों द्वारा पत्रकारों की हत्या और सरकारी पेड न्यूज की खबरों के बीच 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रेस की स्वतंत्रता के मामले में भारत दुनिया के देशों में 140वें पायदान पर हैं।

यह रैंकिंग वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स 2014 में दर्ज की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले साल भारत में पत्रकारों के प्रति काफी हिंसा का माहौल रहा और 13 पत्रकार मारे गए।

इस रिपोर्ट में छत्तीसगढ और कश्मीर को रेखांकित करते हुए कहा गया है कि भारत में पत्रकार सरकारी और गैर-सरकारी दोनों तत्वों के निशाने पर रहे। रिपोर्ट के अनुसार भारत का कोई भी क्षेत्र पत्रकारों के लिए खतरे से खाली नहीं, पर कश्मीर और छत्तीसगढ विशेष रूप से हिंसा और सेंसरशिप के गढ बने रहे।

छत्तीसगढ के जिन इलाकों में माओवादी हिंसा की घटनाएं होती रहती हैं, वहां के पत्रकारों से इस रिपोर्ट का जिक्र करें तो वे छूटते ही कहते हैं, “बिल्कुल सही है। हम हिंसा भी झेलते हैं और सेंसरशिप भी।”

छत्तीसगढ के दो प्रमुख शहर रायपुर और बिलासपुर से प्रकाशित दैनिक अखबारों की संख्या दो सौ से अधिक है। इनमें नई दुनिया, दैनिक भास्कर, टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत, पत्रिका, हरिभूमि और देशबंधु जैसे लोकप्रिय अखबार भी शामिल हैं।

इन अखबारों के स्थानीय संस्करण बस्तर, दुर्ग, अंबिकापुर से भी निकलते हैं। इसके अलावा राज्य के लगभग हर एक जिला मुख्यालय से प्रकाशित होने वाले दैनिक अखबार और पत्रिकाओं की संख्या ग्यारह सौ के आसपास है।

राज्य में सहारा समय, जी टीवी, इंडिया टीवी, साधना टीवी, बंसल न्यूज, आईबीसी 24 जैसे राज्य स्तरीय समाचार चैनल भी हैं।

सेंसरशिप
इन सभी समाचार माध्यमों के संवाददाता लगभग तहसील स्तर पर हैं। लेकिन इन संवाददाताओं के लिए न तो वेतन की ठीक-ठीक व्यवस्था होती है और न ही उनकी सुरक्षा की। संवाददाता होने का पहचान पत्र या टीवी चैनल की माइक आईडी दे कर अधिकांश समाचार माध्यम छुट्टी पा लेते हैं।

अधिकांश संवाददाताओं के लिए आय का माध्यम वह कमीशन होता है, जो विज्ञापन देने के बदले उनकी संस्था उन्हें देती है। ऐसे में आय के दूसरे स्रोत की तलाश करते कथित तौर पर ब्लैकमेलिंग करने वाले पत्रकारों के किस्से भी आम हैं। ठीक उसी तरह नेता, अफसर, पुलिस, ठेकेदार, बिल्डर, नक्सलियों, अपराधियों के गिरोह पत्रकारों को कभी उपकृत करते हैं तो कभी पत्रकार उनके निशाने पर होते हैं।

पिछले तीन दशक से भी अधिक समय से पत्रकारिता कर रहे रायपुर के दैनिक ‘छत्तीसगढ’ के प्रधान संपादक सुनील कुमार का कहना है कि जो अंतरराष्ट्रीय पैमाने 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' के हैं, वे किस हद तक और किस तरह से छत्तीसगढ में लागू होते हैं, इसका अंदाजा मुझे नहीं है।

सुनील कुमार कहते हैं, “हिंसक गतिविधियों वाले इलाके की पत्रकारिता में एक खतरा हमेशा बना रहता है कि जब कभी आप शुद्ध पत्रकारिता के अलावा कुछ भी और काम करते हैं तो आप अपने को खतरे में डालते हैं। दोनों पक्षों में से किसी एक तरफ के निशाने पर आप आ जाते हैं। छत्तीसगढ में जो पत्रकार मारे गए हैं, वे क्या अपनी पत्रकारिता की वजह से मारे गए हैं, इस तथ्य को भी हमें देखना होगा।”

राज्य में सेंसरशिप जैसी बात को भी सुनील कुमार सिरे से नकारते हैं। बकौल सुनील कुमार, “इतने सालों की पत्रकारिता में न तो मैंने इसे देखा-सुना है और न ही कभी मुझसे किसी ने छत्तीसगढ में सेंसरशिप की शिकायत की है। न तो नक्सलियों की तरफ से और न ही सरकार की तरफ से।”

बस्तर के पत्रकार अविनाश प्रसाद की राय है कि बस्तर के जिन इलाकों में सरकार नहीं है, वहां या तो पुलिस है या फिर नक्सली। उन इलाकों में पत्रकारों को दोनों का ख्याल रख कर कोई भी खबर लिखनी होती है।

वह कहते हैं, “रायपुर, दिल्ली के बडे घरानों के अखबारों में मामूली पैसों पर काम करने वाले बस्तर के पत्रकार को हर खबर को लिखने से पहले पचास बार सोचना पडता है कि इससे कौन-कौन नाराज हो सकता है।”

पंजाब, दिल्ली और छत्तीसगढ में कई प्रतिष्ठित अखबारों के संपादक रहे रायपुर के रमेश नैयर का मानना है कि छत्तीसगढ में सरकार और पत्रकार संगठनों दोनों को ही सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।

नैयर कहते हैं, “मैंने आपातकाल भी देखा है और ऑपरेशन ब्लू स्टार का दौर भी। वैसी सेंसरशिप तो छत्तीसगढ में नहीं है लेकिन पक्षपात तो है। सरकार के खिलाफ लिखने पर विज्ञापन पर असर तो पडता है।”

हत्या
बिलासपुर में दिसंबर 2010 में दफ्तर से काम खत्म कर लौट रहे पत्रकार सुशील पाठक की बीच शहर में हत्या कर दी गई थी। सीबीआई की जांच के बाद भी अब तक हत्यारों का पता नहीं है।

इसके अगले ही साल जनवरी 2011 में महासमुंद में पत्रकार उमेश राजपूत की हत्या कर दी गई।

पिछले साल फरवरी में माओवादियों ने सुकमा में एक पत्रकार नेमीचंद जैन की हत्या कर दी थी। इसके बाद दिसंबर में बीजापुर में पत्रकार साईं रेड्डी को माओवादियों ने मार डाला था। इन हत्याओं के बाद पत्रकारों ने माओवादियों की खबरों का बहिष्कार किया था और पद यात्राएं भी निकाली थीं।

राज्य में पत्रकारों पर हमले, उन्हें कथित तौर पर मुकदमों में फंसाने के कई मामले भी सामने आए हैं।

बिलासपुर के पत्रकार हर्ष पांडेय कहते हैं, “बस्तर नहीं, पूरे राज्य के हालात एक जैसे हैं। आप खबरों पर काम कर रहे हैं तो अपनी सुरक्षा का जिम्मा आपको खुद लेना पडेगा।”

बस्तर में शाम के पहले अखबार ‘हाईवे चैनल’ के संस्थापक संपादक, सुदीप ठाकुर इन दिनों ‘अमर उजाला’ दिल्ली में स्थानीय संपादक के पद पर हैं और उनका छत्तीसगढ आना-जाना लगा रहता है। सुदीप इस पूरे मसले को दूसरे तरीके से देखते हैं।

वे कहते हैं, “बस्तर में पत्रकारिता दोधारी तलवार से कम नहीं है। नई आर्थिक नीति लागू होने के बाद अब बस्तर के पत्रकारों पर कॉरपोरेट घरानों का भी दबाव है। कॉरपोरेट और नक्सलियों के बीच के रिश्ते में पत्रकारों के शामिल होने के मामले हमारे सामने हैं। इसकी पडताल जरुरी है।”

राज्य में अधिकांश बडे अखबार किसी ने किसी उद्योग-धंधे से जुडे हुए हैं। ‘दैनिक भास्कर’ समूह अपने पावर प्लांट और कोयला खदानों के लिए अब मशहूर हो रहा है तो कोयला खदानों से अखबार के धंधे में आया ‘हरिभूमि’ राज्य का नंबर वन अखबार का दावा करते हुए मैदान में है।

छत्तीसगढ के कई अखबारों के संपादक रहे वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर मुक्तिबोध पूरे मामले को मीडिया घरानों के दूसरे काम-धंधे और सरकार के साथ उनके व्यवसायिक रिश्ते के साथ देखने की बात करते हैं।

वह कहते हैं, “छत्तीसगढ में प्रत्यक्ष तौर पर पत्रकारों पर कोई दबाव नहीं है। पत्रकारों पर तो उनके मालिकों का दबाव है। एक प्रमुख अखबार ने तो अपने संपादकों को लिखित में निर्देश जारी करके श्रेणियां बनाई हैं। इनमें पहली श्रेणी में जो नाम और संस्थाएं हैं, उनके खिलाफ कुछ भी नहीं लिखने का, दूसरी श्रेणी में वो नाम हैं, जिनके साथ संतुलन बना कर चलना है और तीसरी श्रेणी में ऐसे आईएएस, आईपीएस और बडे अफसरों, नेताओं के नाम हैं, जिनके खिलाफ कभी-कभार लिखने के निर्देश हैं।”
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