मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नई दिल्ली की सीएम रेखा गुप्ता से की मुलाकात
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'प्रदेश की पहचान समृद्ध जनजातीय संस्कृति से जुड़ी'
उन्होंने बताया कि जनजातीय जीवन दर्शन मानवता को टिकाऊ विकास का मार्ग दिखा सकता है। छत्तीसगढ़ की पहचान उसकी समृद्ध जनजातीय संस्कृति से जुड़ी है। राज्य में 42 प्रकार की जनजातियां निवास करती हैं। लगभग 44 फीसदी क्षेत्र वनाच्छादित है। स्वतंत्रता आंदोलन से राष्ट्र निर्माण तक जनजातीय समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। बिरसा मुंडा और वीर नारायण सिंह जैसे महानायकों ने बलिदान का इतिहास रचा।
'जनजातीय संस्कृति के संरक्षण को प्राथमिकता'
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि उनकी सरकार जनजातीय संस्कृति के संरक्षण को प्राथमिकता दे रही है। नया रायपुर में आदि परब, बस्तर पंडुम और बस्तर ओलंपिक जैसे आयोजन होते हैं। ये कार्यक्रम जनजातीय प्रतिभा और पहचान को राष्ट्रीय मंच देते हैं। छत्तीसगढ़ सरकार गोंडी, हल्बी और सादरी जैसी भाषाओं में प्रारंभिक शिक्षा दे रही है। इससे नई पीढ़ी अपनी मातृभाषा और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ी रहेगी। बस्तर से सरगुजा तक देवगुड़ी और मातागुड़ी का संरक्षण भी तेजी से हो रहा है।
'मूल परंपराएं छोड़ने वालों को बाहर किया'
मुख्यमंत्री ने जनजातीय समाज के संवैधानिक अधिकारों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि यह भावना प्रबल हो रही है कि मूल परंपराएं छोड़ने वालों को अनुसूचित जनजाति सूची से बाहर किया जाए। इससे आरक्षण और सरकारी सुविधाओं का वास्तविक लाभ मूल समुदायों को मिलेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह मांग किसी समुदाय के विरोध में नहीं है। यह जनजातीय समाज की अस्मिता और अधिकारों की रक्षा से जुड़ी है। इसे लोकतांत्रिक और संवैधानिक दायरे में उठाया जा रहा है।
कार्यक्रम के दौरान देश के विभिन्न राज्यों से आए जनजातीय कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं। उन्होंने पारंपरिक नृत्य और लोक संगीत से भारत की समृद्ध जनजातीय विरासत दिखाई। लाल किला मैदान में दिनभर मांदर, ढोल और पारंपरिक लोकधुनों की गूंज रही। यह समागम जनजातीय समाज की एकता और स्वाभिमान का प्रतीक बना। यह आयोजन सांस्कृतिक पुनर्जागरण का सशक्त राष्ट्रीय घोष बनकर उभरा।