जब जमीनी हकीकतें उम्मीद से टकराती हैं, तब जन्म लेती हैं सच्ची कहानियां जज्बे की। ऐसा ही एक दृश्य सामने आया है बीजापुर जिले के भोपालपटनम विकासखंड के ग्राम वरदली में स्थित प्राथमिक शाला से। जहां बच्चे छतविहीन स्कूल भवन में टीन की चादरों के नीचे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। लेकिन उनकी आंखों में सपनों की चमक और शिक्षा पाने का जुनून कम नहीं हुआ है।
गर्म हवाओं और तेज बारिश की मार के बावजूद इन नन्हे छात्र-छात्राओं ने स्कूल आना नहीं छोड़ा। रोज सुबह अपने बस्ते उठाए ये बच्चे स्कूल पहुंचते हैं, जहां उन्हें किसी पक्के भवन की सुरक्षा नहीं, बल्कि खुले आसमान और टीन की चादरें ही नसीब हैं। लेकिन ये बच्चे न शिकवा करते हैं, न शिकायत क्योंकि उनके लिए स्कूल एक भवन नहीं, बल्कि भविष्य की सीढ़ी है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकार भले ही भूल जाए, लेकिन हमारे बच्चे नहीं भूलते कि उन्हें कहां पहुंचना है। पूर्व जिला पंचायत सदस्य बसंत राव ताटी ने इस स्थिति को ‘शिक्षा के प्रति बच्चों के समर्पण’ का प्रतीक बताया। उन्होंने प्रशासन से अपील की कि बच्चों की इस भावना का सम्मान किया जाए और जल्द से जल्द स्कूल भवन की मरम्मत का काम पारदर्शिता के साथ पूर्ण किया जाए।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि 'मुख्यमंत्री शाला जतन योजना' के अंतर्गत आवंटित राशि जमीनी स्तर तक नहीं पहुंची और इसकी जांच होनी चाहिए। इस कठिन परिस्थिति में अभिभावकों की भूमिका भी सराहनीय रही है, जिन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाई से दूर नहीं होने दिया।
एक स्थानीय ग्रामीण ने भावुक होते हुए कह कि अगर ये बच्चे इन हालात में भी पढ़ सकते हैं, तो यक़ीन मानिए, ये कल नाम रोशन करेंगे। आज जबकि पूरे देश में शिक्षा को डिजिटल और आधुनिक स्वरूप देने की बात हो रही है, वहीं बस्तर के जंगलों के बीच ये बच्चे हमें याद दिलाते हैं कि असली शिक्षा की नींव जुनून, मेहनत और संघर्ष पर टिकी होती है, भवन भले ही न हो, लेकिन हौसले मजबूत हैं।