जहां एक ओर राज्य सरकार गांव-गांव सुशासन त्योहार मना रही है, वहीं दूसरी ओर उसी शासन की नींव हिला देने वाली तस्वीर भोपालपटनम के नगर पंचायत क्षेत्र के वार्ड क्रमांक तीन से सामने आई है। 60 वर्षीय एलादी सालूबाई अपनी अंतिम सांसों के साथ सिर्फ एक आस लगाए बैठी है कि ज़िंदगी के आखिरी दिनों में पक्के मकान की छांव नसीब होगी? धूप, बारिश और सर्द हवाओं को लकड़ी की झोपड़ी में झेलते-झेलते अब उनकी आंखें कमजोर पड़ चुकी हैं, शरीर जवाब दे चुका है और सरकार से उम्मीदें भी दरकने लगी हैं। जिस झोपड़ी में दीवारें नहीं, सिर्फ लकड़ियां हैं, उसी में वह अपने मजदूर बेटे के साथ जीवन काट रही हैं।
न दोहराई जाए वही गलती जो समय ने की
सालूबाई की झोपड़ी, उनके झुके कंधे और कांपते हाथ प्रदेश की योजनाओं की जमीनी हकीकत बयां कर रहे हैं। दो साल पहले उन्होंने पूरी उम्मीद से आवास योजना में आवेदन दिया। कागजात पूरे थे, पट्टा था, जमीन थी...नहीं थी तो सिर्फ सिस्टम की संवेदनशीलता। नगर पंचायत के बाबुओं के भरोसे वह फाइलें धूल फांक रही हैं और सालूबाई हर दिन थोड़ा और बिखर रही हैं।
सरकार से सवाल नहीं, एक प्रार्थना है
ये कोई आरोप नहीं, ये एक वृद्धा की करुण पुकार है। सालूबाई के सपनों में कोई महल नहीं, सिर्फ एक ऐसा कमरा है जो बारिश में टपके नहीं, जहां लकड़ी की जगह दीवारें हों, जहां वह अपने अंतिम दिन चैन से बिता सकें।
कभी उम्मीद थी, अब समय की दरकार है
कांग्रेस शासन में उन्हें राजीव गांधी आश्रय पट्टा मिला, पर अब जब ज़रूरत है पक्के मकान की, तो सरकारी सिस्टम के कागजी भंवर में उनकी आवाज कहीं खो गई है। नगर पंचायत भोपालपटनम की अध्यक्ष रिंकी कोरम भी खुद मानती हैं कि सालूबाई को आवास मिलना चाहिए और नगर पंचायत की लापरवाही के कारण वह अब तक इससे वंचित हैं। वहीं नगर पंचायत सीएमओ विकास कुमार पटेल का कहना है कि कुछ हितग्राहियों के जमीन दस्तावेज नहीं होने के कारण उन्हें आवास मिलने में दिक्कत आ रही है। लेकिन अब बयान नहीं, समाधान चाहिए। साय सरकार के सुशासन का असली चेहरा दिखाने का वक्त आ गया है। क्या शासन एक बेसहारा वृद्धा को उसकी अंतिम इच्छा पूरी करने का हौसला देगा? सालूबाई की आंखें अब भी इंतज़ार में हैं, कि अब उन्हें जवाब नहीं, घर दीजिए।