छत्तीसगढ़ से होकर गुजरने वाले नेशनल हाईवे तीस पर स्थित केशकाल की घाटी को बस्तर का प्रवेश द्वार कहा जाता है। इस घाटी को पार करते हुए जैसे ही हम कुछ घंटे बाद जगदलपुर पहुंचे, तो शाम के छह बज चुके थे। हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। जगह थी जिला मुख्यालय में स्थित सिटी कोतवाली के पीछे आधुनिक सुविधाओं से युक्त 'पंडुम कैफे'। इस कैफे में कुछ पूर्व आत्मसमर्पित माओवादियों के साथ हिंसा से प्रभावित लोग भी काम करते हैं। इस दौरान पूर्व माओवादियों ने बीते हुए दिनों और मौजूदा बस्तर को लेकर अपनी बात रखी है। इस ग्राउंड रिपोर्ट में जानिए, उन्होंने क्या-क्या बताया?
'अब देश-भर से लोग बस्तर घूमने आ रहे'
आत्मसमर्पण कर चुके पूर्व माओवादी और 'पंडुम कैफे में काम करने वाले हेमुधर नाग बताते हैं, ''यदि आप 2009-10 के बस्तर की बात करेंगे तो वे दिन बहुत कठिन थे। जनसुविधाओं का बड़े पैमाने पर अभाव था। आप सोचिए, ऐसी-ऐसी जगहें थीं, जहां बाइक तो छोड़िए, पैदल जाने में भी कठिनाई होती थी। मैं अपने गांव चंदेला की बात करूं तो वहां बाइक नहीं जा पाती थी। हेलीकॉप्टर से राशन पहुंचाया जाता था। अब मेरे गांव में बिजली, सड़क और आंगनवाड़ी है। मैं ऐसे ही जनसुविधाओं से युक्त बस्तर चाहता हूं।''
बस्तर।
हेमुधर उर्फ पवन नाग (36) पूर्व में आठ वर्षों तक माओवादियों के साथ रह चुके हैं। उनका गांव चंदेला, थाना मारडुम में स्थित है। पवन नाग जब कक्षा पांचवीं में पढ़ रहे थे, तभी उनके घर पर माओवादियों का आना-जाना लगा रहता था। यहीं से वह माओवादियों की पार्टी में शामिल हो गए थे। उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति के तहत 28 मई 2016 को जगदलपुर पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया था। अब पांडुम कैफे में काम कर रहे हैं। अपनी जिंदगी को एक नए तरीके से जी रहे हैं।
यहां के हालात पर वो कहते हैं कि पहले लोग बस्तर आने को तरसते थे। माओवादियों के खौफ की वजह से लोग डरते थे। अब लोग आसानी से आ-जा रहे हैं। देश के कई हिस्सों से लोग हमसे मिलने आ रहे हैं। सरकार से मैं यह चाहता हूं कि बस्तर में जहां विकास नहीं है और बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, वहां जनसुविधाओं की पहुंच बने। अच्छी सड़कें, बिजली और इलाज की व्यवस्था हो।
हेमुधर नाग
- फोटो : अमर उजाला
'अब चैन से जी रहे हैं जिंदगी'
हेमुधर नाग से मौजूदा जिंदगी से जुड़ा सवाल पूछा गया तो वह कहते हैं कि पहले और अब की जिंदगी में बहुत अंतर आया है। माओवादियों के साथ कोई निश्चित ठिकाना नहीं होता था। रहने-खाने का कोई समय नहीं था। जीवन चुनौतियों से भरा हुआ था। जब से मुख्यधारा में आए हैं, चैन से जी रहे हैं। सो रहे हैं, खा रहे हैं। खास से लेकर आम लोगों से मिल-जुल रहे हैं। पहले ऐसा नहीं था। वर्तमान का जीवन अधिक सरल है पूर्व की अपेक्षा।
हेमुधर नाग कैफे में नौकरी करते हुए।
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'हमने कभी नहीं सोचा था कि बस्तर से नक्सलवाद खत्म होगा'
नक्सलवाद के मुद्दे पर हेमुधर कहते हैं कि हम लोगों ने कभी नहीं सोचा था कि बस्तर इतनी जल्दी नक्सलमुक्त हो जाएगा। सरकार ने जो डेडलाइन 31 मार्च 2026 की तय की थी, उसे पूरा किया है। पहले सरकारें यहां चुनाव जीतने के लिए आती थीं। नेता वोट के लिए झूठे वादे करके चले जाते थे, लेकिन मौजूदा सरकार ने बस्तर के लोगों से जो-जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा कर रही है। मेरी बस्तर के सभी बेटा-बेटियों से अपील है वो सब आगे बढ़ें। बस्तर का नाम रोशन करें।
पंडुम कैफे की एक तस्वीर में फगुनी कश्यप व हेमुधर नाग।
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जंगल की जिंदगी छोड़ अब कैफे में काम, फगुनी ने बताया कैसे बदली पूरी जिंदगी
फगुनी कश्यप वर्ष 2023 में माओवादियों के संगठन से जुड़ी थीं। बीते कुछ माह पहले ही उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया था। वर्तमान में वह जगदलपुर स्थित 'पंडुम कैफे' में काम कर रही हैं। उन्होंने माओवादी संगठन में बिताए करीब तीन वर्षों के अनुभव साझा किए।
फगुनी ने बताया, "मैं तीन वर्षों तक पार्टी में शामिल रही थी। वहां का जीवन जटिलताओं से भरा हुआ था। सुबह चार बजे उठ जाती थी। अपनी जगह पर बैठकर उजाला होने का इंतजार करती थी। इसके बाद दैनिक कार्यों में जुट जाते थे। फिर सब लोग साथ में चाय पीते थे। कुछ खाने के बाद सब अपने-अपने काम में जुट जाते थे। यहां मैं सिविल में काम करती थी। विशेष तौर पर मेरे पास स्काउट का काम था। दिन में दो से तीन बार हम लोग अपनी जगह बदलते थे।"
जदगलपुर स्थित पांडुम कैफे।
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'माओवादियों के स्कूल में तीसरी कक्षा तक पढ़ाई'
नक्सली शिक्षा के बारे में फगुनी ने बताया कि माओवादियों के स्कूल में गोंडी और हिंदी भाषा में शिक्षा दी जाती थी। मैंने तीसरी कक्षा तक पढ़ाई की थी, लेकिन मेरे पास प्रमाण के तौर पर कोई अंकसूची नहीं है। मैं आगे भी पढ़ना चाहती हूं। इन स्कूलों में पढ़ने वालों को भूगोल के बारे में भी जानकारी दी जाती थी। जंगलों में कैसे रहना है? यदि पुलिस से सामना हो जाए तो कैसे बचना है? इस तरह के तमाम पार्टी से जुड़े प्रशिक्षण दिए जाते थे। फगुनी ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार जंगल में पुलिस ने उनको और उनकी टीम के सदस्यों को घेर लिया था। उस समय वे तीन लोग थे। बड़ी मुश्किल से बिना गोली चलाए वे दूसरे रास्ते से बचकर आगे निकलीं थी। सुरक्षाबलों से जंगल में उनका यह पहला आमना-सामना था। उस दिन किसी तरह जान बचाकर खुदको सुरक्षित किया था।
'माओवादियों में विवाह के लिए दोनों की सहमति जरूरी'
माओवादियों के बीच होने वाले विवाह के बारे में फगुनी ने बताया कि इसके लिए लड़का और लड़की दोनों की सहमति जरूरी होती है। इसके साथ ही पार्टी के बड़े नेताओं की सहमति भी आवश्यक होती है। जब दोनों पक्षों की सहमति हो जाती थी, तो माओवाद में शामिल लड़के और लड़की का वहीं विवाह करा दिया जाता था।
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फगुनी ने बताया कि माओवादियों के साथ रहते हुए काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ता था। घरवालों से मिलने की अनुमति नहीं थी। वह तीन साल तक माओवादियों के साथ रहीं और इस दौरान एक बार भी अपने घरवालों से नहीं मिल पाईं थी। आवश्यक कार्य पर भी उन्हें मिलने परिजनों से नहीं दिया जाता था। अब वो जब मन करता है, तब घरवालों से मिलने चली जाती हैं। नौकरी करके आत्मनिर्भर बनी हूं। अपने खर्चे और घर वालों के लिए कैफे से काम करके पैसा जुटाती हूं। अब पहले काफी राहत महसूस होती थी। जीवन आराम दायक बना है।
पूर्व आत्मसमर्पित माओवादी लक्ष्मण मंडावी।
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11 की उम्र में माओवाद की राह, 14 साल बाद बदली लक्ष्मण मंडावी की जिंदगी
ये हैं पूर्व माओवादी लक्ष्मण मंडावी (25)। जब उनकी उम्र 11 वर्ष थी, तभी से माओवादी संगठन ज्वॉइन कर लिया था। ये कुल 14 वर्षों तक माओवादी संगठन में रहे। 10 अक्तूबर 2025 को 210 नक्सलियों के साथ जगदलपुर में आत्मसमर्पण किया था। वर्तमान में पंडुम कैफे के साथ जुड़कर आगे बढ़ रहे हैं।
माओवाद के अपने प्रारंभिक दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि 2005 में सलवा जुडूम से जुड़े लोगों ने उनका घर जला दिया था। इससे आहत होकर उन्होंने माओवादी की राह अपना ली थी। लेकिन अब उनकी दुनिया पूरी तरह बदल चुकी है।
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जब उनसे पूछा गया कि माओवादियों के साथ रहने के दौरान बाहरी दुनिया से कैसे संपर्क बनाते थे? इस पर लक्ष्मण मंडावी ने बताया कि रेडियो के माध्यम से समाचार सुनते थे। देश-दुनिया की जानकारी रेडियो के समाचार के माध्यम से मिलती थी। न्यूज पेपर भी आता था। लेकिन जैसे-जैसे तकनीक आती गई, पेपर की जगह ई-पेपर ने ले ली। स्मार्ट मोबाइल फोन और टैब में ही हमें अन्य जानकारियां और समाचार आसानी से मिल जाते थे। इन्हीं जनमाध्यमों के जरिए हम जंगल में रहते हुए बाहरी दुनिया की जानकारी रखते थे। अब हम चाहते हैं कि बस्तर का विकास हो। लोगों के बीच कोई भेदभाव न हो। सब आपसी भाईचारे के साथ रहें।