राजधानी के लाखों लोगों को पानी पिलाने वाली वो खारुन नदी जिसका उद्गम स्थल अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है खर-खर बहने की आवाज से इस नदी का नाम पड़ा जो बालोद जिले के गुरूर ब्लॉक के एक गांव पेटेचुआ से शुरुआत होती है हमने इसकी पड़ताल की तो समझ आया कि यह तो अब सूखने की कगार पर है, हां लेकिन जिस तालाब से यह उद्गम होता है वो आज तक नहीं सूखा बड़े बुजुर्ग बताते हैं हम नहीं जानते कि आखिर इसकी गहराई कितनी है।
जिस जगह पर पहले नदी का उद्गम था वह जगह ऊपरी सतह थोड़ी नम दिखती है परंतु जहां पहले नदी हुआ करती थी वहां अब जंगल पत्थर और खेत बन चुके हैं यूं कह सकते हैं की नदी के उद्गम स्थल से लगभग 5 किलोमीटर तक नदी गायब हो चुकी है हम जब उद्गम स्थल की तलाश में पहुंचे तो वहां कुछ बुजुर्गों ने बताया कि इस गांव में लंबे समय से खारून के उद्गम स्थल के रूप में एक तालाब बना हुआ है जो कभी नहीं सूखता और यही से ही खारुन नदी की शुरुआत हुई थी पहले तो यह जगह हमेशा पानी से लबालब रहता था आपको बता दे की खारुन नदी लगभग 200 गांव की प्यास बुझाते हुए राजधानी तक पहुंचती है परंतु इसका सोर्स पॉइंट अब सूख चुका है।
इस नदी का उद्गम स्थल एक और नाम से जाना जाता है यहां पर आध्यात्मिक नजरिए से क्षेत्र की सबसे बड़ी आस्था के प्रतीक के रूप में मां कंकालिन विराजमान है और लोगों की मान्यता यह भी है की सतह पर बहना छोड़कर यह नदी धरती के भीतर बह रही है जो कि आगे सीधे अपने धारा प्रवाहों के साथ नदी नालों के रूप में देखने को मिलती है खारून नदी मात्र नदी नहीं है बल्कि इसका आध्यात्मिक स्वरूप भी है खारून नाम का कोई अर्थ तो नहीं है लेकिन वहां के रहने वाले लोगों ने बताया कि पूर्वज बताते हैं पहले पानी के झरने से खर खर की आवाज आती थी इसलिए इसका नाम खारून रख दिया गया।
मिट गया निशान
पहले गुरुर तहसील के पेटेचुआ की पहाड़ी से मैदाने से खारून नदी निकलती थी जिसके बाद एक तालाब में यह भरता था और एक संकरी से नाले के रूप में कंकालिन मंदिर तक पहुंच जाता था जिसके बाद वहीं से नदी का शुरुआत होता था लेकिन समय के साथ-साथ उद्गम मैदान पास में लगा हुआ तालाब पहाड़ी मंदिर और इसे लगा हुआ 5 किलोमीटर का क्षेत्र पूरी तरह से सूख चुका है ग्रामीणों ने बताया कि इसके रास्ते एक दौरादे नाम का झरना था जो पहले दिसंबर तक बहता था लेकिन यहां पर अब वो झरना लगभग गायब है।