छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में पोला त्यौहार की एक अनोखी परंपरा है, जो इसे बाकी जगहों से अलग बनाती है। पोला आमतौर पर किसानों द्वारा खेती में मदद करने वाले बैल और गौवंशीय पशुओं की पूजा का त्यौहार है, लेकिन बालोद में यह इससे कहीं ज़्यादा है। यहाँ पोला का त्यौहार बच्चों और उनके खिलौना बैलों का होता है, और इसे 'पोरा' कहा जाता है। आज के दिन बालोद जिले में घर घर बैल की पूजा की जा रही है। और बैल सजाओ प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जा रहा है।
यह परंपरा मुख्य रूप से बालोद, डौंडीलोहारा, गुरुर, और गुण्डरदेही जैसे क्षेत्रों में देखने को मिलती है। इस दिन बच्चे अपने घर के आंगन में मिट्टी और लकड़ी से बने रंग-बिरंगे खिलौना बैल चलाते हैं, जिन्हें 'पोरा-पोरी' कहते हैं।
त्यौहार के पीछे का इतिहास
इस अनोखी परंपरा के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। किंवदंती के अनुसार, प्राचीन समय में, इस क्षेत्र के राजा ने अपने साम्राज्य को बढ़ाने के लिए दूर-दराज के युद्धों में सैनिकों को भेजा। इस दौरान, राज्य में खेती और किसानी का काम ठप्प हो गया, जिससे भुखमरी की स्थिति आ गई। जब सैनिकों को यह खबर मिली, तो वे तुरंत वापस आ गए। वापस आने के बाद, उन्होंने देखा कि बच्चे अपनी गायों और बैलों के साथ खेल रहे थे। यह देखकर, उन्हें खेती का महत्व समझ आया और उन्होंने बच्चों को पोला त्यौहार मनाने के लिए प्रेरित किया। इसी घटना को याद करते हुए, बच्चों ने मिट्टी के खिलौना बैल बनाने शुरू किए और यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही।