अंगदान की कमी से 50 प्रतिशत मरीजों की मौत समय से पहले हो जाती है, जिनके अंग बीमारी की वजह से खराब हो जाते हैं। इन खराब अंगों में हृदय, लीवर, पेनक्रियाज, किडनी, कोर्निया, फेफड़े शामिल हैं। ऐसे मरीजों को बचाने का सिर्फ एक ही तरीका है, वो है ट्रांसप्लांट। ये तभी संभव है, जब अतिरिक्त अंग हो। इसके लिए अंगदान ही एक मात्र तरीका है।
अंगदान दो तरह के हैं। पहला लिविंग डोनर व दूसरा ब्रेन डेथ पेशेंट से। एक तीसरा तरीका भी है, लेकिन फिलहाल उस पर कोई गाइडलाइंस नहीं है, जिसकी वजह से अंगों की वेटिंग लिस्ट बढ़ती जा रही है। 13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस मनाया जा रहा है। एक नजर डालते है अंगदान, ट्रांसप्लांट और उन तमाम पहलुओं पर जिसका हम सभी के लिए जानना जरूरी है।
क्यों जरूरी है अंगदान
बदलती लाइफ स्टाइल और नॉन कम्युनिकेबल (तनाव, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, हृदय की बीमारी, ब्रेन स्ट्रोक, फेफड़े की बीमारी) की बीमारियां बढ़ती जा रही हैं। इसकी वजह से किडनी, हार्ट और लीवर बड़ी संख्या में फेल हो रहे हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल लगभग 95 लाख लोगों की मौत होती है और इनमें से तकरीबन एक लाख लोग अंगदान के लिए सक्षम होते हैं। इसके बावजूद भारत में रोजाना 300 लोग अलग-अलग अंगों के खराब होने की वजह से दम तोड़ देते हैं। इसका मतलब है एक साल में एक लाख से ज्यादा मौतें। डॉक्टरों के मुताबिक मौत के बाद अंगदान करके एक व्यक्ति कम से कम आठ लोगों की जान बचा सकता है। फिर भी गलतफहमियों की वजह से लोग अंगदान करने में हिचकते हैं।
अंगदान के तरीके
1.जीवन के दौरान दान : ट्रांसप्लाटेशन आफ ह्यूमन आर्गन एक्ट 1994 के अनुसार केवल खून के रिश्ते (भाई-बहन, माता-पिता व बच्चे) वाले अपने अंग दान कर सकते हैं। जिंदा रहते वक्त व्यक्ति कुछ अंग दान कर सकता है। इसमें मुख्य रूप से किडनी। हर इंसान के दो किडनी होती है। एक किडनी शारीरिक क्रिया व्यवस्थित करने में समर्थ होती है। दूसरा अंग पेनक्रियाज का हिस्सा। पेन्क्रियाटिक कार्य करने के लिए पेनक्रियाज का आधा हिस्सा पर्याप्त है। तीसरा अंग लीवर का हिस्सा। लीवर के कुछ अंश डोनेट किए जाते हैं, जो बाद में पुनर्जीवित हो जाते हैं।
2.ब्रेन डेड पेशेंट : ब्रेन डेड घोषित होने के बाद सभी अंग डोनेट किए जा सकते हैं। ब्रेन डेड के अधिकतर केस सिर की चोट (एक्सीडेंट), दिमाग में ट्यूमर व स्ट्रोक के मरीज होते हैं। डाक्टरों की टीम पहले मरीज को ब्रेन डेड घोषित करती है। इसमें पेशेंट के परिजनों से स्वीकृति लेनी जरूरी होती है। सहमति के बाद एक्सपर्ट डाक्टर पेशेंट से हृदय, फेफड़े, लीवर, पेनक्रियाज, किडनी, कोर्निया, हार्ट वाल्व, त्वचा, बोन मैरो व रक्त शिराएं सुरक्षित निकाल लेते हैं और ब्लड मैचिंग के बाद मरीज में ट्रांसप्लांट कर दी जाती हैं।
3.कार्डियक डेथ पेशेंट : प्राकृतिक रूप से होने वाली मौतें। हालांकि अब तक इस बारे में कोई गाइडलाइंस नहीं बनी है। इसमें 30 से 60 मिनट के भीतर अंग को निकालना जरूरी होता है। यह उन्हीं मरीजों में संभव है, जिनकी मौत हास्पिटल में हुई हो और सब कुछ तैयार हो। मसलन आपरेशन थियेटर, डाक्टरों की टीम, मरीज के परिजनों की सहमति हो। यदि इसके लिए गाइडलाइंस बनती है तो अंगों का इंतजार कर रहे लोगों को बड़ी राहत मिल सकती है। ब्रेन डेड के मुकाबले कार्डियक डेथ पेशेंट से अंग निकालना काफी चुनौती भरा है। ब्रेन डेड पेशेंट को वेंटिलेटर पर रखकर तीन से चार दिन का इंतजार कर सकते हैं, लेकिन कार्डियक डेथ में ऐसा नहीं होता। 30 से 60 मिनट के भीतर अंग निकालना जरूरी होता है। आईसीयू में कार्डियक डेथ घोषित करने के बाद मरीज को मसाज के जरिए जिंदा रखा गया और फिर अंग निकाले गए।