गांव को संवारने का उठाया बीड़ा
सतीश कौशिक ने शुरू से ही गांव में विकास कराने के साथ लोगों को आगे बढ़ाने का काम किया। वर्ष 2010 में उन्होंने गांव धनौंदा को गोद ले लिया। तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा से मुलाकात कर गांव के विकास के लिए 1.50 करोड़ रुपये का बजट भी दिलाया। हर वर्ष फुटबाल प्रतियोगिता के लिए उनकी ओर से 41 हजार रुपये की राशि निर्धारित थी। अगर उनके पास आने का समय नहीं होता था तब भी यह राशि खेल कमेटी के पास पहुंचाते थे। साथ ही गांव के जोहड़ का नवीनीकरण, खेल स्टेडियम की चहारदीवारी, गांव की गलियों के निर्माण में मुख्य भूमिका रही।
बाबा दयाल मंदिर में कराते थे भंडारा
सतीश कौशिक का गांव के बाबा दयाल के मंदिर से बचपन से ही जुड़ाव रहा था। साल में एक बार वह परिवार सहित मंदिर में पहुंचकर पूजा-अर्चना करते थे और भंडारे का आयोजन कराते थे। उन्होंने गांव में राधा-कृष्ण की मूर्ति की स्थापना कराई थी।
गिल्ली-डंडा और झूना-डंकी से था लगाव
बचपन से ही जब भी सतीश कौशिक गांव आते थे तो अपने दोस्तों के साथ बणी में कड़ी धूप में जाल के पेड़ों पर पील खाने जरूर जाते थे। साथ ही परंपरागत खेल गिल्ली-डंडा और झूना-डंकी (क्षेत्र का एक प्राचीन खेल) आदि से उनका बड़ा लगाव रहा। अपने मित्रों के साथ गांव की बणी व जोहड़ों में वक्त बिताते थे। अपने खास मित्रों से वह लगातार फोन के माध्यम से जुड़े रहते थे।