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जल बंटवारे को लेकर पंजाब सरकार पहुंची सुप्रीम कोर्ट

Sat, 07 Feb 2015 11:18 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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पंजाब सरकार ने नदी जल वितरण के पुनर्निर्धारण के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें भारत सरकार को अंतर्राज्यीय नदी जल विवाद निपटारा कानून-1956 के  सेक्शन-4 के तहत योग्य ट्रिब्यूनल गठित करने का आग्रह किया गया है।
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इसके साथ ही पंजाब की ओर से काफी समय पहले केंद्र के पास इस कानून की धारा-3 के तहत दायर की गई शिकायत पर निर्णय लेने के लिए आवश्यक निर्देश देने की मांग भी की है। पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से यह फैसला देने का आग्रह भी किया है कि हरियाणा और राजस्थान रायपेरियन राज्य हैं या नहीं?

मुख्यमंत्री कार्यालय के प्रवक्ता के अनुसार, यह याचिका सीएम प्रकाश सिंह बादल के निर्देश पर दायर की गई है। राज्य सरकार ने काफी समय पहले केंद्र सरकार से आग्रह किया था कि समय बीतने के साथ रावी और ब्यास नदियों के जलस्तर में आई कमी के मद्देनजर वितरण के संबंध में योग्य ट्रिब्यूनल का गठन किया जाए।
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इसके अलावा पंजाब में भूजल के गिरते स्तर, प्रतिकूल पर्यावरण परिवर्तन के साथ ही 12 मई, 1994 के उत्तर प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के बीच यमुना समझौते के अनुसार यमुना बेसिन क्षेत्रों को 4.65 एमएएफ पानी दिए जाने की वजह से पानी की उपलब्धता और भी घटी है। इन स्थितियों के मद्देनजर भारत सरकार को पंजाब की मांग के अनुसार नदी जल विवाद निपटारे के लिए ट्रिब्यूनल गठन संबंधी निर्देश देने की अपील सुप्रीम कोर्ट से की गई है।

दस वर्ष बीतने पर भी कार्रवाई नहीं
राज्य सरकार ने अपनी अपील में कहा है कि नदी जल विवाद कानून के तहत किसी भी राज्य की शिकायत मिलने के एक वर्ष के भीतर ट्रिब्यूनल का गठन करना होता है। इसके बावजूद पंजाब की ओर से 10 वर्ष पूर्व भारत सरकार के पास दिए आवेदन पर अभी तक कार्रवाई नहीं हुई है।

रावी-ब्यास के पानी पर जताया पहला हक
पंजाब सरकार ने याचिका में दावा किया है कि रावी-ब्यास के पानी पर पहला हक पंजाब का है। हरियाणा ने यमुना बेसिन क्षेत्र में 12 मई, 1994 को यमुना समझौता करके और शारदा यमुना लिंक चैनल का प्रोजेक्ट बनाकर रावी-ब्यास के पानी से अपना अधिकार पूरी तरह गंवा लिया है।

राज्य सरकार ने यह भी तर्क रखा है कि 20-25 वर्ष के बाद पुन: वितरण किया जाना बनता है, इसलिए वैज्ञानिक अनुसंधानों और बदली स्थितियों के मद्देनज़र पानी का पुन: वितरण निर्धारण किया जाना चाहिए।
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