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वोट घटा, चेहरा हटा: पंजाब में कांग्रेस की नई सियासी मजबूरी

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-पंजाब में कांग्रेस ने गुटबाजी को विराम लगाने के लिए कमर कसी
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सुरिंदर पाल
जालंधर। पंजाब कांग्रेस ने आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित न करने के संकेत देकर साफ कर दिया है कि पार्टी अब चेहरे की राजनीति से दूरी बनाना चाहती है। हालांकि यह फैसला रणनीतिक आत्मविश्वास से ज्यादा घटते वोट प्रतिशत, अंदरूनी गुटबाजी और पिछले चुनावी अनुभवों की उपज माना जा रहा है। कांग्रेस नेतृत्व का मानना है कि किसी एक चेहरे को आगे करने से संगठन में नए टकराव खड़े हो सकते हैं।
2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा था। 2017 में जहां पार्टी का वोट शेयर करीब 38.5 प्रतिशत था, वहीं 2022 में यह गिरकर लगभग 23 प्रतिशत रह गया। सत्ता में रहते हुए इतनी बड़ी गिरावट ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे और नेतृत्व क्षमता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने सीटों के लिहाज से कुछ वापसी जरूर की, लेकिन वोट शेयर करीब 26 प्रतिशत तक ही सीमित रहा। इससे स्पष्ट है कि पार्टी की जनाधार वाली पकड़ अभी भी कमजोर बनी हुई है।
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2021 में चन्नी को बनाया था चेहरा
2021 में चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री चेहरा बनाकर कांग्रेस ने दलित कार्ड खेलने की कोशिश की थी, लेकिन तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के साथ खुले टकराव ने पार्टी को भीतर से नुकसान पहुंचाया। नेतृत्व का यह द्वंद्व चुनावी मैदान में साफ दिखाई दिया और अंतत: कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई। यही कारण है कि पार्टी अब किसी एक चेहरे को आगे बढ़ाने से बच रही है।

फिलहाल पंजाब कांग्रेस कई धड़ों में बंटी नजर आती है। पूर्व मुख्यमंत्री, पुराने दिग्गज, युवा नेतृत्व और हाईकमान समर्थक खेमा सभी की अपनी-अपनी दावेदारी है।

मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार
सुखजिंदर सिंह रंधावा, अमरिंदर सिंह राजा वडिंग, परगट सिंह, प्रताप सिंह बाजवा और राणा गुरजीत सिंह जैसे वरिष्ठ नेता मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार माने जाते हैं। ऐसे में किसी एक नाम की घोषणा करना बाकी खेमों को नाराज करने का खतरा पैदा कर सकता है। नो फेस फाॅर्मूला दरअसल संगठन को एकजुट रखने की कोशिश है। नवजोत सिंह सिद्धू की सियासी वापसी को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है, जो कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति को और जटिल बनाती है। दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी ने 2022 में भगवंत मान को मुख्यमंत्री चेहरा बनाकर 42 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए और रिकॉर्ड बहुमत से सत्ता में आई। कांग्रेस अब मुकाबले को व्यक्ति बनाम व्यक्ति की बजाय सरकार के प्रदर्शन बनाम विपक्ष के विकल्प के रूप में पेश करना चाहती है।
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फैसला रणनीति से ज्यादा डैमेज कंट्रोल
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. कुणाल का कहना है कि यह फैसला रणनीति से ज्यादा डैमेज कंट्रोल है। आज का मतदाता स्पष्ट नेतृत्व देखना चाहता है। बिना मुख्यमंत्री चेहरे के कांग्रेस को यह भरोसा दिलाना होगा कि सत्ता में आने पर नेतृत्व को लेकर कोई असमंजस नहीं रहेगा। कुल मिलाकर, पंजाब में कांग्रेस की चेहरा हटाओ नीति गिरते वोट, बिखरते संगठन और पिछले अनुभवों की देन है। यह प्रयोग पार्टी को आंतरिक टकराव से तो बचा सकता है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या बिना चेहरे के कांग्रेस दोबारा मतदाताओं का भरोसा जीत पाएगी, या यही मजबूरी उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएगी।
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