चंडीगढ़। उष्ट्रासन से रीढ़ के दोष और सर्वाइकल खत्म होता है। आसन की पूर्ण स्थिति में शरीर की आकृति ऊंट के समान बनती है। इसीलिए इसे उष्ट्रासन कहते हैं। यह बात भारतीय योग संस्थान सेक्टर-49 के प्रमुख एमएन शुक्ला ने कही। उन्होंने कहा कि हर्निया और अल्सर के रोगी इस आसन का अभ्यास न करें।
आसन करने की विधि...वज्रासन में बैठकर घुटनों पर खड़े हो जाएं। दोनों घुटने और दोनों पंजे कंधों जितनी दूरी पर हो। पंजे लेटे हुए हों। दोनों हथेलियां कमर पर रखें। अंगूठे रीढ़ के निचले भाग पर इस प्रकार रखें कि अंगुलियों का रुख नाभि की तरफ हो और अंगूठे से रीढ़ की मालिश करें। श्वास भरते हुए कमर के निचले भाग से धड़ को पीछे की ओर मोड़ते हुए आसन के समानांतर कर दें और हथेलियों को तलवों पर स्पर्श करें। जंघाओं वाला भाग आसन के लंबवत हो। पूर्ण स्थिति में यथाशक्ति रुक कर सामान्य श्वास लेते रहें। श्वास बाहर निकालते हुए हथेलियां कमर पर ले आएं और वज्रासन में बैठकर विश्राम करें।
यह है उष्ट्रासन से लाभ : इस आसन को करने से रीढ़ के दोष समाप्त होते हैं। इससे सर्वाइकल, स्पॉन्डिलाइटिस, कमर दर्द, स्लिप डिस्क और लंबर क्षेत्र की कठोरता समाप्त होती है। फेफड़े, हृदय और पेट के अंग स्वस्थ बनते हैं। महिलाओं में मासिक धर्म की समस्याएं दूर होती हैं।