पंजाब में किसानों के आंदोलन को शहरी के वर्ग के व्यापारियों ने जिस तरह से खुलकर समर्थन दिया है, इससे भारतीय जनता पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। सूबे में भाजपा नेताओ का किसान आंदोलन में न आने का खामियाजा पार्टी को 2020 पंजाब विधानसभा चुनाव में उठाना पड़ सकता है।
पंजाब के भाजपा नेता तो अब भी इन कृषि विधेयकों की हिमायत कर रहे हैं लेकिन शहरी वर्ग के व्यापारियों ने जिस तरह से शुक्रवार को किसानों का खुलकर समर्थन किया है, उससे भाजपा नेताओं के माथे पर बल पड़ गए हैं। पंजाब में जहां भाजपा और शिअद के बीच गठबंधन टूटने के आसार बन रहे हैं, वहीं भाजपा पंजाब में अकेले अपने बलबूते पर चुनाव लड़ने में अभी सक्षम नहीं है।
1997 में पंजाब शिअद और भाजपा के गठबंधन की सरकार बनी थी तो भाजपा को 23 में से 18 सीटें मिली थी। शहरी वर्ग ही नहीं किसानों ने भी भाजपा पर विश्वास जताया था। 2002 में भाजपा अकाली दल के खिलाफ लहर चली थी तो सूबे में 23 में से सिर्फ तीन सीट मिली थी। कांग्रेस का तब सीपीआई से गठबंधन था।
2007 में भाजपा को 19 सीट मिली थी जबकि 2201 में 12 सीटें मिलीं। 2017 में भाजपा को तीन ही सीट मिली थी। पंजाब में भाजपा जहां शहरी वर्ग वहीं अकाली दल का ग्रामीण क्षेत्रों में वोट बैंक है लेकिन शुक्रवार को सारे समीकरण बदलते नजर आने लगे हैं। शहरी वर्ग खुलकर किसानों की हमदर्दी में उतर आया है।
कारण साफ है कि ग्रामीण इलाकों से बड़े किसान व जमींदार शहरों में शिफ्ट हो चुके हैं और उनकी तरफ से किसानों को खुलेआम समर्थन दिया जा रहा है। भाजपा की तरफ से किसानों के पक्ष में एक भी बयान जारी न करने से किसान वर्ग और शहरी हलकों में भी नाराजगी देखी जा रही है।
किसान नेता बलवंत सिंह का कहना है कि ग्रामीण किसान शहरी वर्ग के साथ जुड़ा है, चाहे वह आढ़ती के साथ हो या दुकानदार के साथ या बीज और कीटनाशक कारोबारी। शहर के व्यापारियों को किसानों की हालत पूरी तरह से पता है और यही वजह है कि शहरी लोगों व व्यापारियों ने किसानों का साथ दिया है।
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