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आपातकाल: 'इंटरव्यू देकर बाहर आते ही गिरफ्तार कर लिया, करंट लगाकर दी यातनाएं'

Tue, 27 Jun 2017 09:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
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Emergency 1975 - फोटो : File Photo
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सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद, एडिशनल सॉलिसीटर जनरल एवं विधि आयोग के सदस्य: मेरी आयु उस समय मात्र 23 वर्ष की थी और मैं पंजाब विश्वविद्यालय छात्र संघ का महासचिव था। राजनीति शास्त्र में एमए पास करने के बाद लॉ विभाग में प्रवेश चाहता था।
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मेरा नाम मेरिट लिस्ट में था, परंतु 13 जुलाई 1975 को जब मैं प्रवेश लेने लॉ विभाग में गया तो बताया कि मेरिट में होने के बावजूद भी प्रवेश नहीं दिया जाएगा, क्याेंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने ऐसा आदेश दिया है। जब मैं इंटरव्यू देकर कमरे से बाहर आया तो मुझे गिरफ्तार कर लिया गया और सेक्टर- 11 के पुलिस स्टेशन में ले जाकर हवालात में बंद कर दिया गया।

अगले दिन अदालत में पेशी के दौरान प्रसिद्ध पत्रकार डॉ. हरिवंश शर्मा और सेक्टर-11 थाने के एसएचओ केके शर्मा मेरे पास आए और मेरे कान में एक शेर कहा ‘यह दस्तूरे जुबां बंदी है कैसा तेरी महफिल का, यहां तो बात करने को तरसती है जुबां मेरी’, मैंने मुस्करा कर उनका धन्यवाद किया। एसएच ओ शर्मा ने हथकड़ी लगाने के बहाने मेरा हाथ पकड़कर कहा कि कृपया मुझे माफ़  करना। में आपको गिरफ्तार नहीं करना चाहता था, परंतु यह मेरी मजबूरी थी।’ इस घटना से यह अंदाजा लगाना कितना सरल है कि उस समय कितना डर और भय का माहौल था।
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...ऐसा लगा कि शायद यह रात जीवन की अंतिम रात होगी

सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद, एडिशनल सॉलिसीटर जनरल - फोटो : File Photo
उसी दिन शाम को मुझे बुडै़ल जेल भेज दिया गया, जहां पूर्व सांसद बाबू श्रीचंद गोयल, पूर्व मुख्य न्यायाधीश जीतेंद्र वीर गुप्ता, उनके पिता बाबू दलीप चंद गुप्ता, पंडित राम सरूप शर्मा, प्रेम सागर जैन, कृष्ण मनचंदा, जगदीश बजाज, जीतेंद्र चोपड़ा, श्रीराम शर्मा, ओम अहूजा, सूरजभान गुप्ता, रविद्र सहगल, राजकुमार गोयल, जय नारायण, सुरेंद्र महाजन, राम लाल गुप्ता सहित लगभग 50 स्थानीय नेता पहले से मौजूद थे। मेरे पर झूठा केस बनाया गया कि मैंने लॉ विभाग के बाहर एक बहुत बड़ी छात्र रैली की तथा उसमें कहा कि हम इंदिरा सरकार का तख्ता पलट देंगे। दिसंबर माह में तब के मजिस्ट्रेट हंस राज नागरा ने मेरे विरुद्ध मुकदमे को खारिज करते हुए मुझे रिहा कर दिया।

27 जनवरी 1976 को मैंने भी अपने 6 साथियों सहित पंजाब विश्वविद्यालय में सत्याग्रह करके गिरफ़्तारी दी। इस जत्थे में स्वर्गीय सुरेंद्र मल्होत्रा एवं वर्तमान में संघ के वरिष्ठ प्रचारक रामेश्वर भी शामिल थे। गिरफ़्तारी के बाद हमें पहले सेक्टर 11 के थाने में, तथा मध्य रात्रि को सेक्टर- 29 के पुलिस लाइन में ले जाया गया। वहां मेरे दाये हाथ की दो उंगलियों पर तांबे की नंगी पतली तारें बांधकर बिजली के करंट लगाकर यातनाएं दी गईं। एक बार तो ऐसा लगा कि शायद यह रात जीवन की अंतिम रात होगी। परंतु तभी पुलिस इंस्पेक्टर के के शर्मा ने वहां आकर उस पुलिस अफसर को जो मुझे यातनाएं दे रहा था कहा ‘चलो बस करो अब बहुत हो गया है।

इसे कुछ हो गया तो जिंदगी भर तुम्हें बचाने कोई नहीं आएगा। वैसे भी यह अपराधी नहीं, राजनैतिक व्यक्ति है। क्या पता कल यही कहीं मिनिस्टर-विनिस्टर बन जाये। अब यह बंद करो।’’ इस पर उस अफ़सर ने मुझे बिजली के झटके देने तो बंद कर दिये परन्तु धमकियों भरा व्यवहार जारी रखा। सुबह सुबह हमें वहां से सैक्टर 17 के थाने में शिफ्ट कर दिया गया।

वे दिन बहुत डरावने ...

सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद, एडिशनल सॉलिसीटर जनरल - फोटो : File Photo
अगले दिन यानि 28 जनवरी 1976 को फिर हमें मजिस्ट्रेट हंस राज नागरा की अदालत में पुलिस ने पेश किया तथा पुलिस ने मेरा रिमांड मांगा। इस पर जज़ ने कहा ‘‘यह सत पाल जैन वहीं है जो पंजाब विश्वविद्यालय का स्टूडैंट लीडर है.....ओ - नो - नो - यह राजनैतिक कैदी है, आपराधिक नहीं। पुलिस रिमांड का कोई मतलब नहीं - मैं इसे बुडैल जेल भेज रहा हूं।’ मैं सच कहता हूं कि यदि उस दिन जज साहिब ने मेरा पुलिस रिमांड दे दिया होता तो दोबारा पुलिस की यातनाओं से जान बचाना असंभव होता।

वे दिन बहुत डरावने थे। रिश्तेदार, सगे, संबंधी, मित्र, शुभ चिंतक, सभी मिलने से डरते थे, बात करने से डरते थे। एक बहुत ही प्रतिष्ठित परिवार जो पार्टी से जुड़ा था, एक दिन सांय को मैं उनके घर गया तो वे सज्जन तुरंत मुझे लेकर बाहर गली में आ गये और मुझसे हाथ जोड़कर कहा कि आगे से मैं उनके घर न आया करूं क्योंकि उनके परिवार वालों को लगता है कि कहीं मेरे कारण वो भी न पकडे़ जाये। ‘तथास्तु’ कहकर मैं वहां दोबारा नहीं गया।

15 अगस्त 1975 को तब हम बुडैल जेल में थे जहां पर बी बी सी से समाचार आया कि बंगलादेश के राष्ट्रपति शेख अब्दुल रहमान की हत्या कर दी गई है। बी बी सी के अनुसार इस घटना ने इंदिरा गांधी को हिला दिया था तथा उन्हें भी किसी अनहोनी का भय सताने लगा था।
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जेल में एक नाई से खबरें पता चलती थीं...

सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद, एडिशनल सॉलिसीटर जनरल - फोटो : File Photo
जेल के अन्दर जब बी बी सी से हिन्दी के समाचार आत थे, तो हम लोग इस तरह इकट्ठे बैठ कर सुनते थे जेल में सप्ताह में केवल एवं वार वीरवार को केवल एक घंटे के लिये पुलिस के पहरे में केवल परिवार जनों से मिलने दिया जाता था। जो लोग बाहर थे, उनकी हालत तो और भी बदतर थी। वे अंडर ग्राउंड रहकर काम करते थे। आपात स्थिति और इंदिरा गांधी की गतिविधियों के सबंध में साइकोस्टाईल पोस्टर बांटना, अपना वेश बदलकर इधर-उधर आना जाना, जो लोग जेलों में बंद है, उनके परिवार से बड़ी सावधानी से संपर्क रखना आदि कार्य अत्यन्त ही कठिन परिस्थितियों में वे कर पाते थे।

जब जयप्रकाश नारायण को चंडीगढ़ लाया गया तो उनका पता हमें जेल में कैदी एक नाई से चला। एक दिन जेल में गायब रहने के बाद अगले दिन उसने हमें बतलाया कि कल उसे जेल सुररिटेंडेंट काले शीशे वाली कार में किसी बजुर्ग की कटिंग करवाने ले गये। वह उनका नाम नहीं जानता था तथा जो हुलिया वह बता रहा था, वह जय प्रकाश नारायण, मोरार जी भाई, लालकृष्ण आडवाणी जैसे कई नेताओं से मिलता था। जब हम सभी असमंजस में पडे तो अचानक मैंने उनसे पूछा कि क्या उस व्यक्ति के नाक पर बड़ा सा नीला तिल भी है ज्योहि उसने हां कही हम समझ गये कि वे जय प्रकाश नारायण ही है जिनके नाक पर एक बड़ा नीला तिल था। जिन्हें पीजीआई में बंदी बना कर रखा गया था।

वे काले दिन और देश भर में विरोधी नेताओं को दी गई यातनायें याद करके आज भी दिल कांप उठता है। लेकिन उस तानाशाही प्रवृति को देश की जनता ने इस कदर ठुकराया कि तानाशाह बनने का स्वप्न देखने वाली इंदिरा गांधी 1977 में लोकसभा की सदस्य भी नहीं बन पाई थी। 
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