टॉयलेट ब्लॉक घोटाले में सीबीआई जांच शुरू होने के बाद अब पार्षद भी शक के दायरे में आ गए हैं। ऐसे में जो पार्षद सेलवेल कंपनी के हक में बोल रहे थे, वे भी अब उसके विरोध में उतर आए हैं।
नए टेंडर के लिए 19 फरवरी की हाउस मीटिंग में एजेंडा पास हुआ था। उस दौरान 13 पार्षदों ने सेलवेल के हक में वोट किया था जबकि 9 पार्षद उनके खिलाफ थे। पक्ष में वोट करने वालों में ज्यादा कांग्रेसी पार्षद और मनोनीत पार्षद थे। भाजपा पार्षदों ने इस फैसले का विरोध किया था।
हालांकि एक भाजपा पार्षद देवेश मौदगिल ने सेलवेल के पक्ष में वोट किया था। वहीं, शनिवार को नगर निगम ने कंपनी के नए टेंडर रद्द करने की कार्रवाई शुरू कर दी है।
ये कहना है मेयर और पार्षदों का
हमें पहले इसके बारे में सही जानकारी नहीं थी। अब सीबीआई जांच चल रही है। अगर कोई डिफॉल्टर होता है तो उस पर कार्रवाई जरूर होनी चाहिए।
हरफूल चंद्र कल्याण, मेयर
उस वक्त हमें गलत जानकारी दी गई थी और हमें पता नहीं था कि इसमें इतनी बड़ी धांधली होगी। अफसरों ने जानबूझ कर सच्चाई छुपाई है। दोषी अफसरों पर कार्रवाई होनी चाहिए और तब तक किसी की ट्रांसफर भी नहीं होनी चाहिए।
दर्शन गर्ग, कांग्रेस पार्षद
मैंने सबसे पहले सेलवेल के खिलाफ आवाज उठाई थी और कमिश्नर को भी शिकायत दी थी। बाद में बदकिस्मती से एफएंडसीसी ने इसे दोबारा पास कर दिया। अब कंपनी का टेंडर जरूर रद्द होना चाहिए।
सतीश कैंथ, कांग्रेस पार्षद
अभी तक तो कागजों को देखते हुए सब कुछ ठीक ही लग रहा था। वैसे भी एक टॉयलेट की मेंटेनेंस पर 30-40 लाख खर्चा आता है। अगर यही काम 12 हजार में होता है तो ठीक ही है। हां अगर कंपनी का कोई बकाया है तो जरूर वसूला जाना चाहिए। इस मामले में गलत यह हुआ कि किसी की जिम्मेवारी नहीं तय की गई।
देवेश मौदगिल, भाजपा पार्षद
मैं इस मामले में कुछ नहीं कहना चाहूंगा।
- सतप्रकाश अग्रवाल, कांग्रेस पार्षद
इस घोटाले के बारे में सबको पता भी था, लेकिन सभी ने सेलवेल कंपनी को दोबारा टेंडर देने का ही फेवर किया था।
- सौरभ जोशी, भाजपा पार्षद
हाउस मीटिंग में मैंने आधे घंटे तक पूरे घोटाले के बारे में डिटेल से बताया था लेकिन उस वक्त सब ने इस पर ध्यान नहीं दिया। कांग्रेस के सभी पार्षद तो कंपनी की ही तरफदारी कर रहे थे।
-सतिंदर सिंह, भाजपा पार्षद