हर अभिभावक का सपना होता है कि उनका बेटा बड़ा होकर अच्छी नौकरी करे और खूब नाम कमाए। पंचकूला के रहने वाले भूपेश के माता-पिता की भी कुछ ऐसी ख्वाहिश रखते थे। एमबीए करने के बाद भूपेश इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो के साथ जुड़े और कई इंटरनेशनल ब्रांड के साथ काम करने का मौका मिला। साल 2014 में वे जापान में जाकर बस गए, लेकिन कुछ नया करने की तड़प ने उन्हें ज्यादा दिन तक वहां टिकने नहीं दिया। साल 2016 में वे वापस आए।
खेतीबाड़ी बैकग्राउंड होने के कारण उन्होंने किसानों के लिए कुछ नया करने की ठानी। काफी रिसर्च के बाद उन्होंने सोचा कि क्यों ना गुड़ की टॉफी बनाकर बाजार में बेचा जाए। काफी कुछ खोने और सीखने के बाद जैगिक कैंडी के नाम से अपने उत्पाद को बाजार में उतारा। यह काम आसान नहीं था। कई धक्के खाने पड़े। मायूसी भी आई। लोगों ने ताने भी मारे कि लाखों की नौकरी छोड़कर यह काम क्यों कर रहे हैं, लेकिन भूपेश अपनी धुन में लगे रहे और कामयाबी भी मिली।
अब उनकी टॉफियां एमेजॉन, फ्लिपकार्ट और स्नेपडील जैसी कई शॉपिंग वेबसाइट पर उपलब्ध है। कई शहरों के स्टोर में भी भूपेश की गुड़ वाली टॉफियां मिलेंगी। ये पांच फ्लेवर में उपलब्ध है। इसमें मुख्य रूप से सौंफ, आंवला, हल्दी, मुरिंगा और अदरक शामिल हैं।
कई मुश्किले आईं, लेकिन नहीं रुके कदम
भूपेश कहते हैं कि बिजनेस के बारे में सोचना और उसे चलाना दोनों में जमीन आसमान का अंतर है। एक साल तो इस बात को समझने में लग गया कि गुड़ को टाफी की शक्ल में कैसे लाया जाए। साल 2017 में पैकिंग की मशीन नहीं होने पर हाथों से उसका रैप तैयार कर दुकानों में खुद जाकर उसे बेचना पड़ा।
भूपेश कहते हैं कि इस लाइन में गलती करने के बाद ही कुछ नया सीखने को मिलता है। दो साल में यह समझ आ गया कि बिजनेस को चलाने के लिए कुछ लोगों को और साथ में जोड़ना में पड़ेगा। फिर बचपन के दोस्त नवदीप खेड़ा को जोड़ा। फिर किसानों के खेत पहुंचे और वहीं पर मशीन लगाकर प्रोडक्शन किया। लेकिन प्रोडक्शन का सपोर्ट नहीं मिलने के कारण वहां फिर से रुकना पड़ा।
उन्नति का साथ मिला तो आई उन्नति
भूपेश के पास बिजनेस को चलाने और मार्केर्टिंग का जबरदस्त अनुभव आ चुका था। बस उन्हें प्रोडक्शन का सपोर्ट चाहिए था। यह सहयोग उन्हें तलवाड़ा स्थित उन्नति को-आपरेटिव से मिला। उनके पास किसानों और उनके उत्पादों की फौज है। दोनों मिले और फिर से इस बिजनेस को रन किया। अब स्थिति यह है कि एक दिन में 500 किलो गुड़ की टॉफी बनाकर बेच सकते हैं, जबकि पहले एक समय यह था कि 65 किलो से ज्यादा गुड़ की टाफी बनाकर नहीं बेच पाते थे।
मेरे पास गुड़ की खेती करने वाले किसानों के खूब फोन आते हैं और कहते हैं कि वे जुड़ना चाहते हैं। अब मैं इन किसानों के खेत में ही माइक्रोप्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर विचार कर रहा हूं। अभी टाफी तीन रुपये में आ रही है। मुझे इसे एक रुपये में लेकर आना है।
- भूपेश सैनी, युवा इंटरप्रेन्योर