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देखिए एक बिजनेसमैन, जो जीता है सिर्फ भंगड़े के लिए, तैयार कर चुके हैं 15 से ज्यादा टीमें

Sat, 22 Feb 2020 02:37 PM IST
खुशबू गोयल संजीव पंगोत्रा, चंडीगढ़
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भंगड़ा सिखाते गुरप्रीत सिंह - फोटो : अमर उजाला
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कहावत है कि सफलता प्राप्त करनी हो तो जुनून पैदा करो। सेक्टर 21 के गुरप्रीत सिंह प्लाहा ने भंगड़ा सीखने के लिए अपने अंदर के जुनून को जगाया और 15 से ज्यादा भंगडे़ की टीम तैयार कर दी है। उन्हें भंगड़े के अलावा बैले और शम्मी (गिद्दा की तरह पंजाबी नृत्य) में भी महारत हासिल है। वे स्कूलों में जाकर भंगड़े की ट्रेनिंग देते हैं। जरूरतमंद से कोई फीस नहीं लेते हैं। वर्कशॉप करते हैं।
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हाल ही में टीएफटी में उन्होंने दो दिन की वर्कशॉप भी लगाई थी। भंगड़े के प्रति उनके जोश का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने नेत्रहीन लड़कियों और सीनियर सिटीजन की टीम तैयार कर दी थी। वे मूल रूप से बाथ फिटिंग की मैन्युफैक्चरिंग कंपनी को संचालित करते हैं। अपने बिजनेस में व्यस्त रहने के बावजूद उनकी जान भंगड़े में बसती है।

जब वे आठवीं क्लास में थे, तभी भंगडे़ का चस्का लग गया था। उस दौरान वे नार्थ जोन कल्चर में किसी कार्यक्रम को देखने गए थे। वहां पर कुछ लोगों को भंगड़ा डालते देखा तो तभी भंगड़ा सीखने का ठान लिया। उन्होंने अपने पिता से बात की। पिता ने उस्ताद गरीबदास से बात की और गुरप्रीत को भंगड़ा सिखाने के लिए तैयार कर लिया। आठवीं क्लास की वार्षिक छुट्टियों में उन्होंने भंगड़े की एबीसीडी सीखी और कुछ दिनों में वे हुनरमंद की निगाहों में छा गए।
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सीमित न रहे कला

उसके बाद उन्होंने लगातार कई मेलों में परफार्मेंस की। दूर-दराज से लोगों के बुलावे आने लगे। जब इस बारे में स्कूलों को पता चला तो वे अपने बच्चों को ट्रेंड करने के लिए गुरप्रीत को बुलाने लगे। उनके पास विदेशों से भी कई परफार्मेंस के लिए निमंत्रण आया, लेकिन वे नहीं गए। प्लाहा का मनाना है कि उन्होंने जिस कला में निपुणता हासिल की है, वह सिर्फ उनके तक सीमित न रहे। इस कला को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना ही उनका मकसद है। इसलिए वे बच्चों को भंगड़ा सिखा रहे हैं।

...लेकिन हार नहीं मानी
गुरप्रीत सिंह बताते हैं कि एक दिन उन्हें विचार आया कि स्पेशल बच्चों के लिए कुछ अलग किया जाए। उनके मन में विचार आया कि नेत्रहीन बच्चों को भंगड़ा सिखाया जाए। इसके लिए उन्होंने सेक्टर 26 स्थित ब्लाइंड स्कूल के कुछ बच्चों को चुना और उन्हें ट्रेनिंग दी। शुरुआत में बच्चों को बहुत परेशानी आई। बच्चे कई गलतियां करते हैं। स्टेप ठीक से नहीं कर पाते। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानीं। खुद से चैलेंज लिया और कड़ी मेहनत के बाद नेत्रहीन बच्चों की टीम तैयार कर दी।
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