चंडीगढ़ के टैगोर थियेटर में संजीव अभयंकर की प्रस्तुति
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चंडीगढ़ में सेक्टर 18 स्थित टैगोर थिएटर में शनिवार की शाम को प्रसिद्ध गायक संजीव अभयंकर ने यादगार बना दिया। मौका था चंडीगढ़ संगीत नाटक अकेडमी की ओर से क्लासिक वोकल म्यूजिक प्रोग्राम का। इस मौके पर संजीव अभयंकर ने अपनी शानदार प्रस्तुति देकर हाल में बैठे श्रोताओं का मन मोह लिया। इस शाम की शुरूआत उन्होंने राग मारवा से की।
इसके बाद राग मधुकौंस, राग होरी पर प्रस्तुति दी। इसके बाद कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए संजीव ने मीरा भजन जिसमें ......में तो सावरें केरंग राची और राग किरवानी पर अधारित कबीर के ..... लगन बिन लागे न पर प्रस्तुति देकर खुब तालियां बटोरी। मंच पर उनके साथ तबले पर विनोद लेले और हरमोनियम पर पारोमिता मुखर्जी ने भी उनका खुब साथ निभाया।
पैसाें केलिए नही दिल के लिए गाता हूं- मेरी मां ही मेरी पहली गुरु हैं रही। उन्होंने बचपन से ही मुझे एक बात सिखाई की कभी भी पैसों के लिए मत गाना। जब भी गाना गाओं तो दिल के लिए गाना। उनकी बताई इस बात को आज भी मानता हूं और मुझे लगता है कि इसी वजह से मैं इस मुकाम पर पहुंच पाया हूं।
यह कहना है जाने-माने गायकपंडित जसराज के शिष्य पंडित संजीव अभयंकर का। वह श्निवार को टैगोर थिएटर में आयोजित कार्यक्रम में भाग लेने के सिलसिले में शहर पहुंचे। इस दौरान उन्होंने बातचीत में बताया कि मेरी मां मेरे हर कार्यक्रम के बाद वह मुझे मेरी गलती के बारे में भी बताती।
11 साल की उम्र से गाना- संजीव अभंयकर ने बताया कि मैं जब 11 साल का था तो तब से ही मंच पर गाना शुरू कर दिया। यह बात वर्ष 1981 की है इसके बाद इसी वर्ष दिसंबर में मैंने अपनी प्रस्तुति दी,जिसके लिए मुझे 1000 रूपये और चांदी की ट्राफी मिली।
प्ले बैक सिंगिग करने वाला पेटिंग ब्रश की तरह- संजीव ने कई हिन्दी फिल्मों के लिए प्ले बैक सिंगिग भी की है लेकिन हमेशा के लिए प्ले बैक सिंगिग करने में विश्वास नहीं करते। क्योंकि उनका मनाना है कि प्ले बैक सिंगिग करने वाला पेटिंग के ब्रश की तरह होता है। जिसका कोई भी प्रयोग कर सकता है। लेकिन कार्यक्रम करने वाला डायरेक्टर की तरह होता है जिसके हाथ में मंच को सजाने का सारा जिम्मा होता है और वह अपने अनुसार कलाकारी कर सकता है।