पंजाब की ओर से जल समझौता रद्द कर दिए जाने के बाद हरियाणा विधानसभा में लगभग हर साल और तकरीबन विधानसभा के प्रत्येक सत्र में एसवाईएल का मुद्दा उठता रहा है। इसी माह 8 मार्च को पंजाब और 14 मार्च को हरियाणा विधानसभा का बजट सत्र आरंभ होगा। चूंकि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, इसलिए दोनों विधानसभाओं में एसवाईएल पर चर्चा स्वाभाविक है। हालांकि इस बीच मामले पर कोई प्रस्ताव पारित किया जाना संभव नहीं होगा।
दूसरी ओर सतलुज-यमुना लिंक (एसवाईएल) नहर के मामले की सुप्रीम कोर्ट में 8 मार्च से नियमित सुनवाई होने से हरियाणा सरकार को राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई इस बात पर होनी है कि पंजाब सरकार द्वारा नदी जल समझौते को रद्द किया जाना सही है या गलत। लेकिन यह मुद्दा ऐसे मौके पर चर्चा का विषय बन गया है, जब पंजाब में चुनावी गतिविधियां तेज पकड़ चुकी हैं।
इधर, हरियाणा के लिए यह मामला ऐसे समय में सुर्खियों में आया है जब प्रदेश के हर व्यक्ति की नजर जाट आरक्षण आंदोलन के कारण हुई तबाही पर टिकी है। हरियाणा में जहां भाजपा सत्ता में है, वहीं पंजाब में यह साल विधानसभा चुनाव का है और सत्ता में भाजपा अकाली दल की साझीदार है। हरियाणा सरकार इसे एसवाईएल में पानी पहुंचने की ओर एक कदम के रूप में देख रही है।
इसी मुद्दे पर सत्ता में आए थे कैप्टन
जाहिर है चुनावी साल में अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला हरियाणा और राजस्थान के पक्ष में आया तो मौजूदा बादल सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती है। कैप्टन अमरिंदर ने इसी मुद्दे के बल पर साल 2007 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल को करारी शिकस्त दी थी।
कोर्ट के जरिये लेंगे पानी का हक
हरियाणा के कृषि एवं सिंचाई मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ का कहना है कि पंजाब अगर हरियाणा के हिस्से का पानी नहीं देगा, तो इसे सुप्रीम कोर्ट के जरिए लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र के हलफनामे को अगर पंजाब ने चुनौती दी, तो हरियाणा इसके लिए पहले से तैयार है। उनका कहना है कि एसवाईएल हरियाणा के लिए जीवनरेखा के समान है। हरियाणा अपने हिस्से का ही पानी मांग रहा है।