जनता के भीतर से अकाली दल के प्रति भरोसा टूट गया है और पार्टी बुरी तरह से विधानसभा चुनाव हार गई। बावजूद इसके सुखबीर बादल ने अध्यक्ष पद से त्यागपत्र नहीं दिया। उस भरोसे को दोबारा से कायम करके पार्टी व पंजाब को बचाने की कोशिश जारी रहेगी।
कांग्रेस सरकार ने पंजाब को बर्बादी की तरफ धकेल दिया है। जनता ने निजी तौर पर उन्हें फर्श से अर्श पर पहुंचाया और उनकी भावना है कि पंजाब व पार्टी के हित में काम किया जाए। पार्टी को उन्हीं उद्देश्यों से जोड़ने की इच्छा है जिस उद्देश्य से अकाली दल को पैदा किया गया था।
अकाली दल, इस मौके पर अमनवीर सिंह चैरी, एसजीपीसी सदस्य मनजीत सिंह, हरदेव सिंह रोगला व जयपाल सिंह, पूर्व डीजीपी इजहार आलम, अजीत सिंह चंदूराइयां, सतवंत सिंह सराओ, सुनीता शर्मा, परमजीत कौर विर्क समेत भारी संख्या में पदाधिकारी हाजिर रहे।
पटियाला में सुखबीर सिंह बादल के सम्मान में 20 दिसंबर को होने वाली रैली में पूर्व वित्त मंत्री परमिंदर सिंह ढींढसा के शामिल होने की अटकलों पर विराम लगाते हुए उनके पिता व राज्यसभा सदस्य सुखदेव सिंह ढींढसा ने कहा कि परमिंदर उस रैली में नहीं जाएंगे और वह उनके साथ ही रहेंगे।
उन्होंने कहा कि अकाली दल की साख गिरने के जिम्मेदार सुखबीर बादल ही हैं और श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी के बाद तो लोगों का गुस्सा ज्यादा बढ़ गया। उन्होंने कहा कि एसजीपीसी सियासी संरक्षण से मुक्त होनी चाहिए और श्री अकाल तख्त की मर्यादा कायम रहनी चाहिए। अगले एक वर्ष के समागम की घोषणा जल्द होगी। अकाली दल की परंपराओं पर पहरा देते हुए धार्मिक व सियासी चुनाव को अलग रखा जाएगा।
उन्होंने कहा अकाली दल से नाराज होकर सैकड़ों नेता घरों में बैठे हैं, जिनसे संपर्क किया जा रहा है, वह अपना दर्द बया कर रहे हैं। जल्द ऐसे नेता सामने आएंगे। बुधवार की बैठक में जिले के हलका प्रभारियों के नहीं आने के संबंध में ढींढसा ने कहा कि उन्हें जनता की ताकत की जरूरत है। राज्यसभा सदस्यता नहीं छोड़ने पर उन्होंने कहा कि बीबी राजिंदर कौर भट्ठल यह पद हासिल करना चाहती हैं। उनके लिए वह यह पद नहीं छोड़ेंगे। अकाली दल के किसी नेता को यह पद मिलता तो वह यह पद भी त्याग देते।