सरोद और रबाब वादक पद्मश्री उस्ताद गुलफाम अहमद हर रोज सुबह सरोद और रात में रबाब पर रियाज करते हैं। उनका कहना है कि यदि रियाज न करें तो न नींद आती है और न भूख लगती है। हर रोज कम से कम छह घंटे रियाज करते हैं।
पद्मश्री उस्ताद गुलफाम अहमद चंडीगढ़ सेक्टर 18 के टैगोर थिएटर में साहित्योत्सव जश्न ए अदब कारवां कल्चरल विरासत की ओर से आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आए थे। अमर उजाला ने उनसे खास बात की।
उन्होंने कहा कि जब वे रबाब बजाते हैं तो अफगानी लिबास पहनते हैं। उनके पूर्वज अफगानिस्तान से भारत आकर बस गए थे।
पांच वर्ष अफगानिस्तान में रहकर सिखाया...
उस्ताद गुलफाम अहमद ने बताया कि भारत सरकार ने उन्हें अफगानिस्तान के बच्चों को रबाब बजाना सिखाने के लिए भेजा था। वे वर्ष 2009 से लेकर 2014 तक काबुल स्थित दूतावास में रहे। वे वहां पर रबाब सिखाते थे। उन्होंने कहा कि हर रोज एक घंटा हिंदी और तीन घंटे रबाब सिखाता था। हिंदी इसलिए सिखाया कि वहां के बच्चे उर्दू जानते थे। संगीत उर्दू में नहीं है। इसलिए उन्हें हिंदी सिखाना पड़ा। उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में 185 विद्यार्थियों को रबाब, सरोद, सितार और हारमोनियम बजाना सिखाया।
उन्होंने कहा कि रबाब बजाना अपने पिता से सीखा। उन्होंने कहा कि 2006 से लेकर 2008 तक पंजाब में बहुत लोगों को रबाब बजाना सिखाया।
200 वर्ष के बाद दरबार साहिब में रबाब से हुआ कीर्तन
उन्होंने बताया कि वर्ष 2007 की 30 मार्च याद रहेगी। उनके सिखाए हुए शागिर्द ने अमृतसर साहिब स्थित श्री दरबार साहिब में रबाब से कीर्तन किया। उन्होंने कहा कि उन्हें बताया गया कि रबाब से 200 वर्ष के बाद दरबार साहिब में कीर्तन हुआ है। जालंधर में संगीत कार्यक्रम में रबाब बजाया था। मेरी बहुत तारीफ हुई। दो वर्ष जिसमें 2006 से 2008 तक पंजाब के बहुत से लोगों को रबाब बजाना सिखाया।
उन्होंने कहा कि उनके पास दो वाद्ययंत्र सरोद और रबाब हैं।