गांव में घरों के अंदर खाना बनाने के लिए जलाए जाने वाले लकड़ी से उत्पन्न होने वाले प्रदूषण पर काबू के लिए पीजीआई के विशेषज्ञ ने पीयू के विशेषज्ञों के साथ मिलकर एक विशेष प्रकार का चूल्हा तैयार किया है।
यह चूल्हा कम लकड़ी जलने से ज्यादा ऊर्जा तो उत्पन्न करेगा ही, साथ ही उससे जहरीला धुआं भी बेहद कम मात्रा में निकलेगा। इससे धुएं से होने वाली बीमारियों पर भी अंकुश लगेगा। इस चूल्हे में लगा फ्यूल मीटर ईंधन की मात्रा भी बताता रहेगा। इस चूल्हे की मदद से महिलाएं खाना बनाने के साथ ही मोबाइल भी चार्ज कर सकेंगी।
चूल्हे का नाम है K1
K1 स्टोव नाम के इस चूल्हे की परिकल्पना करने वाले पीजीआई सामुदायिक चिकित्सा विभाग के प्रोफेसर रविंद्र खैवाल ने बताया कि इसे पीयू के पर्यावरण अध्ययन विभाग की प्रोफेसर सुमन मोर, अभिषेक कुमार और लक्ष्य आदित्य के साथ मिलकर तैयार किया गया है। यहां के का मतलब क्लीन से है। ये चूल्हा लोहे और मिट्टी से तैयार किया गया है।
प्रो. रविंद्र का कहना है कि इसका डिजाइन तैयार करते हुए उन्होंने इस बात का ध्यान रखा कि यह बेहद हल्का हो ताकि इसे आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा सके। वहीं इसमें पंखा और फ्यूल मीटर शामिल किया गया जिससे ईंधन की मात्रा की जानकारी तो मिले ही साथ ही कम से कम धुंआ उत्पन्न हो।
एक साल में किया गया तैयार
प्रो. रवींद्र ने बताया कि इस चूल्हे को एक साल में तैयार किया गया है। गांव में अब भी महिलाएं एलपीजी का उपयोग छोटे-मोटे कामों के लिए करती हैं। खाना बनाने में अब भी घरों के अंदर चूल्हा काफी मात्रा में उपयोग किया जा रहा है जिससे प्रदूषण पर काबू नहीं मिल पा रहा है। इस चूल्हे की मदद से ईंधन का उपयोग कम करते हुए ज्यादा लाभ प्राप्त किया जा सकेगा। इसके लिए पीजीआई पेटेंट कराने की तैयारी में है।
लकड़ी का धुआं बेहद खतरनाक
लकड़ी का धुआं रसायनों और कणों का एक जटिल मिश्रण है जिसमें शामिल हैं। लकड़ी का धुआं 100 से अधिक विभिन्न रसायनों और यौगिकों से बना होता है, जिनमें कण, कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन, वाष्पशील कार्बनिक यौगिक (वीओसी), डाइऑक्सिन, सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक शामिल हैं।
ये हो सकता है मर्ज
इसके धुएं से शरीर के हर अंग को नुकसान पहुंच सकता है, जिसमें हृदय और फेफड़ों की बीमारी, मधुमेह, मनोभ्रंश, बुद्धि में कमी और अवसाद में वृद्धि शामिल है। बच्चों और अजन्मे बच्चों को सबसे अधिक कष्ट हो सकता है। लकड़ी का धुआं घर के अंदर और बाहर दोनों जगह की हवा की गुणवत्ता को प्रभावित करता है। यह मोटे एवं महीन कणों से बना होता है। मोटे कणों में कालिख, धूल और पराग शामिल हो सकते हैं। सांस लेने पर ये कण फेफड़ों और संकीर्ण वायुमार्ग में बस जाते हैं।
इन्हें खतरा ज्यादा
बुजुर्ग लोग
छोटे बच्चे
अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी श्वसन संबंधी बीमारियों वाले लोग
हृदय रोग से पीड़ित लोग
दुष्प्रभाव और भी हैं
आंखों, गले और नाक में जलन, खांसी, सांस लेने में दिक्क्त और अस्थमा का बढ़ना।
हकीकत... आप भी जान लें
- विकासशील देशों में ठोस बायोमास ईंधन जलाने से 16% कण उत्पन्न होते हैं।
- लगभग 3 अरब लोग खाना पकाने के लिए प्रदूषणकारी ईंधन का उपयोग करते हैं।
- गर्भवती महिलाओं में मृत शिशु के जन्म का 50% अधिक जोखिम।
- वैश्विक स्तर पर एक अरब बच्चे एचएपी के उच्च स्तर के संपर्क में हैं।
- 2016 में वैश्विक मृत्यु दर का 7.7% घरेलू वायु प्रदूषण से जुड़ा था।
- 18% स्ट्रोक 27% इस्केमिक हृदय रोग
- 27% तीव्र निचले श्वसन रोग
- 20%-क्रोनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज
- 8% फेफड़ों का कैंसर