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Chandigarh News: पीयू को हाईकोर्ट से झटका, यूआईएलएस निदेशक पद पर सरबजीत कौर की नियुक्ति रद्द

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चंडीगढ़। यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज (यूआईएलएस) निदेशक पद पर राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर सरबजीत कौर की नियुक्ति को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गलत बताते हुए रद्द कर दिया है। पीयू को यह झटका देते हुए अब हाईकोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के तहत छह सप्ताह में नई नियुक्ति करने का आदेश दिया है।
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यूआईएलएस की प्रोफेसर श्रुति बेदी ने याचिका दाखिल करते हुए इस संस्थान के निदेशक पद पर प्रोफेसर सरबजीत कौर की नियुक्ति को चुनौती दी है। याची ने बताया कि सरबजीत कौर पॉलिटिकल साइंस की प्रोफेसर हैं और ऐसे में उन्हें यूआईएलएस का निदेशक नहीं बनाया जा सकता। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार कानूनी शिक्षा देने वाले किसी भी संस्थान का निदेशक या डीन केवल उस व्यक्ति को बनाया जा सकता है जिसके पास कानूनी शिक्षा देने का 15 वर्ष का अनुभव हो। प्रो. सरबजीत कौर के पास यह अनुभव नहीं है। इसके बावजूद पीयू ने सभी नियमों को ताक पर रखते हुए उनकी नियुक्ति इस पद पर कर दी है।
याची ने हाईकोर्ट से अपील की कि नियमों के खिलाफ जाकर की गई इस नियुक्ति को रद्द किया जाए। पीयू ने कहा कि यूनिवर्सिटी के कैलेंडर के अनुसार सबसे वरिष्ठ प्रोफेसर को रोटेशन के आधार पर विभाग अध्यक्ष नियुक्त किया जाता है। समानता के आधार पर किसी शिक्षक से यह अधिकार नहीं छीना जा सकता। इसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया का कोई दखल नहीं होना चाहिए।
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हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि विधि शिक्षण संस्थानों के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों का पालन करना जरूरी है। जब किसी लॉ कॉलेज के प्रिंसिपल की नियुक्ति के लिए बार काउंसिल के नियम बाध्य हैं तो पीयू या इसके किसी संस्थान पर इसे लागू करने में क्या समस्या है। इन संस्थानों में पढ़ने के बाद विद्यार्थी वकालत के पेशे में आएंगे और ऐसे में संस्थान प्रमुख की कानूनी पृष्ठभूमि जरूरी है।
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के नियमों के अनुसार विधि संस्थान के प्रमुख के पास कानून में पीएचडी व 15 वर्ष का अनुभव जरूरी है। हाईकोर्ट ने कहा कि पहले पीयू ने मान्यता अवधि बढ़ाने के लिए बार काउंसिल ऑफ इंडिया में हलफनामा दिया था कि बीसीआई की शर्तें पूरी करने वाला ही विभाग प्रमुख है तो अब अपने पक्ष से पलटने का क्या औचित्य है। इन टिप्पणियों के साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका को मंजूर करते हुए नियुक्ति रद्द करने का आदेश दिया है।

पीयू की दलील खारिज
हाईकोर्ट ने पीयू के इस तर्क को खारिज कर दिया कि संस्थान के निदेशक का पद केवल मानद पदनाम है। हाईकोर्ट ने कहा कि संस्थान का प्रमुख होना, केवल एक मानद पदनाम नहीं है, क्योंकि विभाग के शिक्षण, अनुसंधान और प्रशासनिक कार्यों का समन्वय करना, वित्तीय शक्तियों का प्रयोग करना अकादमिक नेतृत्व प्रदान करना उनकी ही जिम्मेदारी होता है।
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