उन्होंने कहा कि शब-ए-बरात एक त्योहार नहीं बल्कि अपने अंदर झांकने और अल्लाह के सामने आत्म शुद्धि का मौका देता है। इस रात अल्लाह की इबादत की रात है। इसमें दुआएं कबूल होती हैं और अल्लाह गुनाह माफ करते हैं।
इस पवित्र रात को इबादत, दुआ, तौबा और खैर-खैरात के साथ गुजारना चाहिए न कि खेल तमाशे में। गुनाहों से छुटकारा और अल्लाह की रहमत के हकदार तभी बन सकते हैं, जब इस अल्लाह के और पैगंबर के हजरत मोहम्मद के बताए हुए रास्ते पर चलें।
उन्होंने कहा कि इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार अल्लाह इस रात में मगरिब (सूर्यास्त) से लेकर फज्र (सुबह) तक जमीन पर अपनी रहमत बरसाता है। इस वजह से मुस्लिम समुदाय के लोग विशेष तौर पर नफिल नमाज, सदका, खैरात, जिक्र, कुरान की तिलावत, अपने और पूरे विश्व के कल्याण के लिए अल्लाह से रहमत और मगफिरत तलब करने में पूरी रात इन नेकियों के साथ गुजारते हैं। यदि किसी को कोई बीमारी और तकलीफ न हो तो वह अगले दिन का रोजा रखते हैं। शब-ए-बरात में वह पूर्वजों, जो इस दुनिया से जा चुके हैं उनकी मगफिरत के लिए कब्रिस्तान जाकर या अपने स्थान पर रहकर अल्लाह से खुसूसी द्वारा करते हैं।
सेक्टर-45 के फैजुल इस्लाम मदरसा के प्रिंसिपल कारी शमशेर अली का कहना है कि शब-ए-बरात में अल्लाह ताला अपने बंदों के तमाम मामलात तय फरमाते हैं। यानी इस रात में दुआएं कबूल होती हैं और गुनाह माफ होते हैं। इस रात में अल्लाह ताला आने वाले पूरे साल की तकफसीलात फरिश्तों के हवाले करते हैं।