मनोहर लाल खट्टर कबड्डी के प्रेमी हैं। उनके भाई चरणजीत सिंह के अनुसार, यह उनका पसंदीदा खेल है। बचपन में भी कबड्डी से उनका काफी लगाव रहा है।अनुशासन प्रिय हैं। अपने साथ काम करने वालों को अनुशासनहीनता पर टीम से बाहर करने में देरी नहीं लगाते।मेहनती, जिद्दी के होने साथ-साथ जो ठान लें, उसे पूरा करके दम लेते हैं। कितना भी मुश्किल काम हो सोच लिया तो करना है।कम बोलते हैं। शांत स्वभाव के होने के कारण स्थिति को परखने के बाद ही अपना निर्णय सुनाना पंसद करते हैं।संस्कृति से प्रेम करने वाले खट्टर की भाषा पर अच्छी पकड़ है। नपा-तुला शब्द ही बोलते हैं। उनकी शैली प्रभावित करने वाली है।संकट के क्षण में भी खट्टर के चेहरे का भाव एक जैसा रहता है। कोई खास अंतर या फिर बदलाव नहीं आने देते।खट्टर आईटी के मामलों में काफी एक्सपर्ट हैं। हर लेटेस्ट टेक्नोलॉजी को जानने और सीखने का प्रयास करते रहते हैं।सुबह जल्दी उठकर पिछले दिनों में किए कामों और मिलने वालों से की बातों पर गहनता से विचार करना रूटीन में शामिल है।उनकी नजरों से कोई भी चीज आसानी से नहीं निकल सकती। वे हर दस्तावेज का गहनता से अध्ययन करते हैं।चर्चा में हर छोटे से लेकर बड़े तक को मौका देते हैं। उनका पक्ष सुनते और जानते हैं। सभी कार्यकर्ताओं से मिलते हैं।अपने रिश्तेदारों और करीबियों की भी कोई सिफारिश नहीं सुनते हैं। कहते हैं समय पर सब काम खुद हो जाएगा।
दो बार मौत को भी मात दी है खट्टर ने
प्रदेश के 20वें सीएम के तौर पर 26 अक्टूबर को शपथ लेने जा रहे मनोहर लाल खट्टर ने दो बार मौत को भी मात दी है। खंड छछरौली के गांव खदरी के सरपंच और अंबाला के सांसद रत्न लाल कटारिया के निजी सचिव भोपाल सिंह खदरी प्रदेश के मुखिया के साथ दो बड़े हादसों के गवाह रहे हैं। खट्टर के शपथ ग्रहण की पूर्व संध्या पर उन्होंने बताया कि कैसे खट्टर ने मौत को मात दी।
दलदल में फंस गए थे खट्टर: घटना मार्च 1985 की है। भोपाल सिंह खदरी ने बताया कि यह उस वक्त खट्टर यमुनानगर के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जिला प्रचारक के रूप में काम कर रहे थे। सहारनपुर जिले के गांव नारायणपुर में संघ का एक कार्यक्रम होना था। मैं और मनोहर लाल, स्वामी अखिलानंद को निमंत्रण देने जा रहे थे।
खट्टर बाइक चला रहे थे और खदरी उनके पीछे बैठे थे। नदी के पास एक कच्चे रास्ते पर बाइक बढ़ाई, लेकिन थोड़ी दूर जाने के बाद हम दोनों बाइक सहित एक नाले में गिर गए। पता चला यह तो दलदल है। हम बुरी तरह से गर्दन तक दलदल में फंस गए। मुंह और नाक में कीचड़ घुसने से सांस लेने में दिक्कत होने लगी।
पास ही पशु चराने वाले लोगों ने लाठियों और रस्से की मदद से बाहर निकाला। खट्टर बेहोश हो गए थे। नदी से पानी लाकर उनके चेहरे को साफ किया और मुंह और नाक से कीचड़ (गारा) निकाला। काफी देर बाद वे पूरी तरह से नार्मल हुए।
ट्रेन चल पड़ी और वे गेट पर लटके रहे
भोपाल सिंह ने बताया कि 1995 में 11 से 13 नवम्बर तक भाजपा का राष्ट्रीय अधिवेशन मुंबई में हुआ। हरियाणा के कार्यकर्ताओं ने 14 नवंबर शाम को मुंबई से दिल्ली के लिए ट्रेन पकड़ी। ट्रेन चलते ही भिवानी और अंबाला के कार्यकर्ताओं के बीच सीट को लेकर विवाद हो गया।
दूसरे कोच में बैठे मनोहर लाल को सूचना मिली तो वे अगले स्टेशन पर उतरकर कार्यकर्ताओं के कोच में चले गए। उन्हें समझाने के बाद वे अपने कोच में वापस आने लगे। इसी दौरान ट्रेन चल पड़ी और वे दौड़ कर गेट पर चढ़ गए, लेकिन किसी ने गेट को अंदर से बंद कर लिया था।
वे काफी देर तक दरवाजा खोलने के लिए चिल्लाते रहे, लेकिन किसी ने नहीं खोला। उस वक्त वे लूंगी और बनियान पहने थे। लोगों ने समझा कि वे कोई डकैत हैं। मनोहर लाल ने दरवाजे के हैंडल को एक हाथ से पकड़े रखा और दूसरे हाथ से खिड़की को जोर जोर से पीटते रहे। सर्दी के कारण उनके हाथ-पैर अकड़ने लगे, कभी भी हाथ छूटने की स्थिति हो गई।
खदरी ने बताया कि मैं भी उसी कोच में था, लेकिन सोया हुआ था। शोर सुनकर नींद खुली। लोगों से घबराहट का कारण पूछा तो बताया कि दरवाजे पर कोई लटका हुआ है और दरवाजा खोलने के लिए कह रहा है। मैंने जोर से आवाज लगा कर पूछा मनोहर जी हैं क्या? क्योंकि उस डिब्बे में सिर्फ मुझे पता था कि मनोहर लाल डिब्बा छोड़कर आगे गए।
उन्होंने कहा ‘जी भाई जी’, लोगों के विरोध के बावजूद मैंने दरवाजा खोला और मनोहर जी को अंदर खींचा। उनका हाल बेहाल था और सर्दी से पूरा शरीर कांप रहा था। हम लोगों ने उनको कंबल में लपेटा और हाथ पैरों को अपनी हथेलियों से रगड़ा। अगले स्टेशन पर चाय पीने के बाद जब वे नार्मल हुए तब सबको डांट पिलाई कि दरवाजा क्यों नहीं खोला।
टेक्नोलॉजी पसंद खट्टर नहीं हटते पीछे
चंडीगढ़ भाजपा पार्षद दल के नेता अरुण सूद को हरियाणा के नए मुख्यमंत्री खट्टर के साथ काम करने का मौका मिला है। चार साल पहले सूद ने नया ब्लैकबेरी का मोबाइल फोन खरीदा। खट्टर के पास पहले ही आई फोन था।
सूद अपने पुराने मोबाइल से नए ब्लैक बेरी में फोन बुक ट्रांसफर करना चाहते हैं। उस समय ऐसी कोई तकनीक नहीं आई थी, लेकिन सूद ने जब खट्टर को बताया तो उन्होंने दोनों फोन लिए और रात 10 से लेकर एक बजे तक फोन लिस्ट ट्रांसफर करने में जुटे रहे। जब तक काम नहीं हुआ तब तक पीछे नहीं हटे।
भोजनालय संभालने में माहिर हैं खट्टर
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कैंपों में जाने वाले स्वयंसेवकों को मनोहर लाल खट्टर अक्सर भोजनालय में मिलते रहे हैं। प्रदेश स्तर पर गर्मियों में आयोजित होने वाले संघ शिक्षा वर्गों में संघ के पदाधिकारियों के जिम्मे अलग-अलग व्यवस्था रहती है।
इनमें शारीरिक ट्रेनिंग के साथ-साथ भाषणों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, लेकिन खट्टर के जिम्मे आमतौर पर भोजनालय की व्यवस्था रहती है। उनके साथ काम करने वाले इसे उनकी सादगी की पराकाष्ठा मानते हैं।
कार्यकर्ताओं का रखते हैं पूरा ध्यान
1995 में जिस समय मनोहर लाल हरियाणा भाजपा के संगठन महामंत्री थे तब वे रोहतक जिले में कलानौर मंडल की बैठक लेने पहुंचे। बैठक में सभी कार्यकर्ता आए, लेकिन वहां के तत्कालीन मंडल अध्यक्ष रमेश भाटिया बैठक में नहीं पहुंच सके।
खट्टर ने कार्यकर्ताओं से भाटिया के बारे में पूछा तो पता चला कि उनको बुखार है। बैठक संपन्न होने के बाद खट्टर सीधे रमेश भाटिया के घर पहुंचे और उनका कुशलक्षेम पूछा।
व्यवस्था कौशल का हर कोई मुरीद
1993 में रोहतक में उनके साथ संघ प्रचारक रहे पलवल निवासी प्रवीण गर्ग उनके सादगीपूर्ण जीवन व्यवहार और व्यवस्था कौशल से अत्यंत प्रभावित हैं। प्रवीण गर्ग कहते हैं कि खट्टर ने कभी भी अपने व्यवहार से किसी कार्यकर्ता को नाराज नहीं होने दिया।
वे हंसमुख स्वभाव के धनी और हर आधुनिक तकनीक के प्रति जिज्ञासा रखते हैं। प्रवीण कहते हैं कि 1986 में हिसार और 1987 में कुरुक्षेत्र में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में मनोहर लाल उनके मुख्यशिक्षक रहे हैं।
हर काम पर पैनी नजर
कई साल पहले फरीदाबाद के सूरजकुंड में भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी। इस बैठक के लिए प्रदेश भर के पार्टी कार्यकर्ताओं के जिम्मे अलग-अलग व्यवस्था थी। रोहतक के कार्यकर्ताओं की ड्यूटी नई दिल्ली स्टेशन पर बाहर से आने वाले पदाधिकारियों को रास्ता बताने की लगी थी, लेकिन अनेक कार्यकर्ता जिज्ञासावश सूरजकुंड पहुंच गए, वहां पहुंचते ही मनोहर लाल खट्टर ने इन्हें डांटा। कहा, कि तुम्हारी ड्यूटी तो रेलवे स्टेशन पर लगी थी, यहां क्या कर रहे हो। कार्यकर्ता यह जानकर हैरान थे, खट्टर को एक-एक कार्यकर्ता की जिम्मेदारी का कितना ध्यान है।