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दुरदर्शन पर मिल्खा सिंह का संघर्ष देख लोग हो गए उनके फैन

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चंडीगढ़। 1960 के दशक में मिल्खा सिंह चंडीगढ़ में आकर बस गए थे। उस दौरान चंडीगढ़ वाले तो उन्हें जानते थे, लेकिन देश के बाकी हिस्सों के बहुत कम लोग उनकी उपलब्धियों से परिचित थे। उस समय न तो आज की तरह मीडिया था और न ही उनके बारे में किसी किताब में चैप्टर था। 1960 के बाद जन्मे बहुत कम लोगों को मिल्खा के बारे में पता था। साल 1990 में जब दूरदर्शन ने फ्लाइंग सिख के नाम पर उनके ऊपर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई तो घर-घर उनके नाम की चर्चा शुरू हो गई। उस समय सिर्फ दूरदर्शन ही चलता था। हर रविवार को आधे घंटे के सीरियल में उनके जीवन संघर्ष के बारे में बताया गया। इस सीरियल के बाद लोग मिल्खा सिंह के फैन हो गए। उस दौरान एक संयोग यह भी हुआ था कि साल 1988 और 1992 में ओलंपिक खेलों में भारत के पास कोई मेडल नहीं आया था। पदक न आने की निराशा और दूरदर्शन में मिल्खा के काबिलियत देख लोग चर्चा करने लगे कि एक मिल्खा था, जो खूब मेडल लाता था, अब कोई ऐसा नहीं है। इससे लोगों में भी मिल्खा को जानने की दिलचस्पी बढ़ी। उसके बाद डायरेक्टर ओमप्रकाश मेहरा ने उनके जीवन पर ‘भाग मिल्खा भाग’ फिल्म बना दी। इससे साल 2010 के बाद की पीढ़ी भी उन्हें जानने लगी।
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इसलिए चंडीगढ़ में बसे थे
मिल्खा सिंह का चंडीगढ़ के साथ खास नाता रहा है। बंटवारे के बाद पाकिस्तान ने लाहौर को पंजाब की राजधानी बनाया और हिंदुस्तान के पंजाब ने चंडीगढ़ को। बंटवारे के बाद हुए दंगों को उन्होंने अपनी आंखों से देखा था। उनके सामने उनके परिवार का कत्लेआम हुआ था। पाकिस्तान वाले पंजाब से उनकी यादें जुड़ी हुई थीं। इसलिए उन्होंने चंडीगढ़ में बसने का मन बनाया। वे हैदराबाद रहे, दिल्ली रहे, पटियाला रहे, लेकिन परिवार उन्होंने चंडीगढ़ में ही बसाया। उनकी शादी भी चंडीगढ़ में हुई थी। एक अहम कारण यह भी था कि पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों ने उन्हें चंडीगढ़ में नौकरी केलिए ऑफर किया था और उनके लिए विशेष पद सृजित किया था। पंजाब स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में ज्वाइंट डायरेक्टर का पद संभालने के बाद उन्हें सेक्टर 7 में सरकारी हाउस नंबर 59 अलॉट हुआ। उन्होंने पंजाब एजूकेशन डिपार्टमेंट डायरेक्टर स्पोर्ट्स का भी पद संभाला। रिटायरमेंट के बाद वे सेक्टर आठ में आकर बस गए थे। चंडीगढ़ में बसते हुए उन्होंने गोल्फ खेलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे वे रेगुलर गोल्फर बन गए। उनके गोल्फ खेलने से ही उनका बेटा जीव भी गोल्फ की तरफ आकर्षित हुआ।
सेक्टर 22 के खेत में करने जाते थे शिकार, तेंदुए का भी किया था शिकार
मिल्खा सिंह शिकार के भी शौकीन थे। 60 के दशक के दौरान चंडीगढ़ उतना विकसित नहीं हुआ था। सेक्टर 17 व सेक्टर 22 भी काफी घना जंगल हुआ करता था। वे अक्सर सेक्टर 22 में शिकार के लिए जाते थे। कभी तीतर को मार गिराते तो कभी किसी दूसरे पक्षी को। यह कहा जाता था कि एक बार उन्होंने एक तेंदुए का भी शिकार किया था। उनकी आत्मकथा ‘द रेस आफ माई लाइफ’ में उनकी एक फोटो भी है, जिस पर वे हाथ में पिस्टल पकड़े हैं और साथ ही एक मरा हुआ तेंदुआ है।
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साथियों के मददगार
मिल्खा सिंह जैसा संघर्ष शायद ही किसी ने झेला होगा। जिन आंखों ने अपने मां-बाप व भाई बहन का कत्लेआम देखा होगा, वे कैसे आगे बढ़ने का सपना देख सकती हैं। इसके बावजूद वे बहुत ही परोपकारी थे। समय-समय पर फौज व खेल से जुड़े अपने साथियों की मदद करते थे। पैसों से भी कई साथियों की मदद की है। उनमें गजब का जोश होता था। उनसे बातचीत के दौरान जब कोई उनकी पुरानी कहानी छेड़ देता था तो वे खुद जोश में आकर उसे बताने लगते थे। जब किसी इवेंट में उन्हें बुलाया जाता था तो कहते थे कि वे सिर्फ पांच से दस मिनट रुकूंगा, लेकिन जब उनके पास माइक आता था तो पौना घंटा से कम बोलते नहीं थे। अक्सर वे स्टेज पर माइक पकड़कर दौड़ने लगते थे। जब भी कभी उनकी मौत पर मजाक होता था तो लोग कहते थे कि जब उनकी अंतिम यात्रा जा रही होगी तो वे अर्थी से भी उठकर भागने लगेंगे।
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सौरभ दुग्गल, खेल पत्रकार (तीन दशक से मिल्खा सिंह से जुड़े रहे)
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