माना जाता है कि 13 अप्रैल 1919 को शहीद ऊधम सिंह जलियांवाला बाग में मौजूद थे और वे नरसंहार के चश्मदीद गवाह थे, जबकि सच तो इससे उल्टा ही है। ब्रिटिश रिकार्ड के मुताबिक, शहीद ऊधम सिंह अमृतसर के जलियांवाला बाग में उपस्थित नहीं थे। लंदन के केकस्टन हॉल में माइकल ओडवायर को मौत के घाट उतारने के बाद 5 जून 1940 को अदालत में जज एटकिन्सन के सवाल के उत्तर में ऊधम सिंह ने बयान दिया था कि जब अमृतसर में नरसंहार हुआ था, उस वक्त वह ईस्ट अफ्रीका गए हुए थे।
कैनन रॉ पुलिस के अनुसार, 13 मार्च 1940 को ऊधम सिंह ने बयान दिया कि 1918 में वह भारत से ईस्ट अफ्रीका चले गए थे। वह नैरोबी में जर्मनी की एक कंपनी में मोटर मैकेनिक के तौर पर 18 माह काम करके जून 1919 में भारत लौटे थे। जबकि 17 जून 1940 को एक ब्रिटिश अधिकारी ने भारत के सचिव को पत्र लिखकर बताया कि माइकल ओडवायर की हत्या के बाद उन्होंने जेल में ऊधम सिंह से मुलाकात की थी। इस दौरान ऊधम सिंह ने बताया कि उनकी बहन व भाई जलियांवाला बाग के नरसंहार में मारे गए थे। नरसंहार के वह चश्मदीद गवाह हैं।
इस अधिकारी ने भारतीय सचिव को आदेश दिया कि इस मामले की जांच रिपोर्ट भेजी जाए। ब्रिटिश सरकार ने ऊधम सिंह के इन बयानों की सत्यता जानने के लिए भारत में जांच करवाई, लेकिन सटीक नतीजे तक नहीं पहुंच पाई। 20 जून 1940 को भारत के गृह विभाग ने रिपोर्ट भेजी कि इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो पाई है कि ऊधम सिंह के किसी रिश्तेदार की जलियांवाला बाग में मृत्यु हुई है और उस समय ऊधम सिंह वहां मौजूद थे या नहीं।
उक्त तमाम रिकॉर्ड शहीद ऊधम सिंह के जीवन को समर्पित लेखक राकेश कुमार की पुस्तक ‘हीरो इन द कॉज ऑफ फ्रीडम’ में ब्रिटिश फाइलों के हवाले से दर्ज किया है। दूसरी तरफ अब तक यही माना जाता है कि इस दिन नरसंहार को ऊधम सिंह ने साक्षात अपनी आंखों से देखा था और वे भीड़ को पानी पिलाने की सेवा कर रहे थे।
कुछ इतिहासकार मानते हैं कि नरसंहार के बाद ऊधम सिंह, जलियांवाला बाग पहुंचे थे और मृतकों के शव निकालने में मदद की थी। वहां के दर्दनाक हालात देखकर उनका मन बेहद आहत हुआ था। ब्रिटिश सरकार ने देश के इस महान योद्धा को 31 जुलाई 1940 को पेंटोविले जेल में सुबह नौ बजे फांसी दी थी।
फिर उठा शहीद ऊधम सिंह मेमोरियल के निर्माण का मुद्दा
लंबे संघर्ष के बावजूद शहीद ऊधम सिंह की जन्मस्थली पर शहीद की यादगार बनाने का सपना साकार नहीं हो सका है। करीब दो दशक से शहीद की यादगार बनाने का मामला सियासत की भेंट चढ़ता आ रहा है। शहीद के बलिदान दिवस 31 जुलाई और जन्म दिवस 26 दिसंबर आने पर यादगार बनाने की मांग जोर पकड़ने लगती है।
एक बार फिर 31 जुलाई के नजदीक आते ही यादगार निर्माण को लेकर आवाज उठने लगी है। आम आदमी पार्टी ने तो सरकार की नीयत पर सवाल उठाते हुए नसीहत दे डाली है कि यदि यादगार का निर्माण 31 जुलाई से पहले शुरू नहीं होता तो कैप्टन सरकार को इस महान शहीद को श्रद्धांजलि देने का हक नहीं है।
गौरतलब है कि बेअंत सिंह सरकार के बाद से शहीद की यादगार बनाने को लेकर सियासत का खेल चलता आ रहा है। सत्ता में आई सरकारों ने यादगार बनाने के लंबे चौडे़ वायदे किए। पिछली अकाली-भाजपा सरकार के समय केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने यादगार बनाने का नींव पत्थर भी रखा। वर्तमान कैप्टन सरकार भी ढाई वर्षों से यादगार बनाने के दावे करती आ रही है।
पिछली 31 जुलाई को मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने ट्वीट करके यादगार के लिए एक करोड़ रुपये जारी करने संबंधी जानकारी दी थी। बावजूद इसके काम शुरू नहीं हो सका। 26 दिसंबर को शहीद के जन्म दिवस के मौके पर कांग्रेस की हलका प्रभारी दामन बाजवा ने मजबूती से सीएम के समक्ष मुद्दा उठाया और मुख्यमंत्री ने बजट जारी कर दिया। इसके बाद टेंडर प्रक्रिया शुरू हो गई। कई माह बीत जाने के बाद यादगार का निर्माण कार्य सरकारी प्रक्रियाओं में अटक कर रह गया।