शिअद भी फिलहाल झुकने को तैयार नहीं था और भाजपा भी। इसी बीच अमित शाह के अकेले चुनाव लड़ने के संकेतों के बाद शिअद अब नए समीकरणों की संभावनाओं को खंगालने में जुट गया है।
वहीं शिअद से गठबंधन के मुद्दे पर भाजपा में भी दो धड़े हैं। वरिष्ठ नेताओं का एक धड़ा गठबंधन की पैरवी करता है तो दूसरा अकेले दम पर चुनाव लड़ने का दम भरता है। शिअद को इस बात का आभास है कि पिछले कुछ समय से गिरते जा रहे पार्टी के ग्राफ को उठाने के लिए उन्हें एक मजबूत सहयोगी सियासी दल की जरूरत है।
इसके अलावा शिअद की नजर दलित वोट बैंक पर भी है। हालांकि पिछले विधानसभा चुनाव में इसके लिए शिअद ने बहुजन समाज पार्टी से हाथ भी मिलाया था मगर इसका खास सियासी फायदा नहीं हुआ। शिअद इस बार भी बसपा को साथ लेकर चल सकता है।
शिअद के लिए फायदेमंद रहा भाजपा से गठजोड़
- साल 2022 के विधानसभा चुनाव में शिअद ने बसपा से गठबंधन किया। शिअद को 3 व बसपा को 1 सीट मिली।
- साल 2017 में शिअद ने भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। शिअद को 15 व भाजपा को 3 सीटें मिलीं।
- साल 2012 का चुनाव शिअद ने भाजपा के साथ मिलकर लड़ा। शिअद ने 56 और भाजपा ने 12 सीटें जीतकर सरकार बनाई।
- साल 2007 में भाजपा ही शिअद की सियासी साथ बनी। शिअद ने 48 और भाजपा ने 19 सीटों पर कब्जा जमाकर सत्ता पाई।
- साल 2002 के विधानसभा चुनाव के दौरान शिअद ने भाजपा के साथ-साथ डेमोक्रेटिक बहुजन समाज मोर्चा के साथ गठबंधन किया। शिअद को 41 व भाजपा को 3 सीटें मिलीं। मोर्चा का खाता तक नहीं खुला।
- साल 1997 के चुनाव में शिअद ने 75 सीटें और सहयोगी दल भाजपा ने 18 सीटें जीती और सरकार बनाई।