उन्होंने बताया कि 5364 मीटर की ऊंचाई पर एवरेस्ट बेस कैंप आता है। जहां पर्वतारोही को ट्रेनिंग दी जाती है। इसी दौरान एडवांस में पर्वतारोही के लिए ऑक्सीजन सिलिंडर कैंप में पहुंचा दिए जाते हैं, ताकि वह अगले कैंप में जाते ही ऑक्सीजन सिलिंडर लगा सके। खिलेरी ने बताया कि उसके बाद 6000 मीटर की ऊंचाई पर कैंप-1 आता है। यहां पर्वतारोही आसानी से स्टे कर सकता है और उसे ऑक्सीजन सिलिंडर की जरूरत नहीं होती लेकिन कैंप-2 में अधिकतर पर्वतारोही ऑक्सीजन सिलिंडर का इस्तेमाल कर लेते हैं।
रोहताश खिलेरी का कहना है कि पर्वतारोही जितनी ऊंचाई पर जाता रहेगा उसका उतना ही ऑक्सीजन लेवल कम होता जाएगा। हालांकि यह पर्वतारोही की बॉडी पर निर्भर करता है। उन्होंने बताया कि माउंट एवरेस्ट पर जाने के दौरान पर्वतारोही को पांच से छह ऑक्सीजन सिलिंडर की जरूरत होती है। एक सिलिंडर साढ़े तीन किलो का होता है। जिसमें दो से तीन किलो ऑक्सीजन होती है।
6400 मीटर की ऊंचाई पर कैंप-2
पर्वतारोही रोहताश का कहना है कि 6400 मीटर की ऊंचाई पर कैंप-2 है। अधिकतर पर्वतारोही यहां से ऑक्सीजन सिलिंडर लगाना शुरू कर देते हैं। जिन पर्वतारोही में बिना ऑक्सीजन सिलिंडर चढ़ने की क्षमता होती है वह चढ़ जाता है लेकिन कैंप-3 में उसे ऑक्सीजन सिलिंडर लगाना ही पड़ता है। 7200 मीटर की ऊंचाई पर कैंप-3 है। कारण है कि कैंप-3 से चढ़ाई करना काफी मुश्किल होती है। एनर्जी बचाने के लिए पर्वतारोही को ऑक्सीजन सिलिंडर लगाना जरूरी होता है।
चढ़ाई के समय पर्वतारोही शिवांगी हुई थी कोरोना संक्रमित
पर्वतारोही शिवांगी पाठक माउंट ल्होत्से की चढ़ाई के दौरान कोरोना संक्रमित हो गईं। उनका ऑक्सीजन लेवल सिर्फ 18 रह गया था, लेकिन मजबूत इच्छा शक्ति के दम पर वह 10 दिन में ही स्वस्थ हो गईं, उन्होंने फिर से चढ़ाई शुरू कर दी है। शिवांगी पाठक ने 9 अप्रैल को माउंट ल्होत्से की चढ़ाई शुरू की थी।
पहाड़ों पर ऑक्सीजन लेवल कम हो जाता है। 18 ऑक्सीजन लेवल आना मौत के बेहद करीब होता है। ऐसे में वेंटिलेटर न मिले तो मौत होना तय है।- डॉ. ज्ञानेंद्र, फिजिशियन, नागरिक अस्पताल, हिसार।