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हिंदी जगत के जाने-माने साहित्यकार डॉ. परेश नहीं रहे, साहित्यकारों में फैली शोक की लहर

Fri, 03 Aug 2018 10:28 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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साहित्यकार डॉ. परेश
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हिंदी के जाने-माने साहित्यकार और हजारी प्रसाद द्विवेदी के खास शिष्य रहे डॉ. परेश का वीरवार को सुबह 8.00 बजे देहांत हो गया। 15 अगस्त, 1939 को जन्मे डॉ. परेश पंजाब यूनिवर्सिटी के हिंदी विभाग के पूर्व चेयरमैन थे। उन्होंने विभिन्न विधाओं में अब तक 15 किताबें लिखी थी। डॉ. परेश का ‘अकहानी और अकविता’ आंदोलन में विशेष योगदान रहा है। डॉ. परेश की देश की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में सैकड़ों लेख, कविताएं व कहानियां निरंतर छपते रही हैं।
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उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी लेखनी पर विराम नहीं लगा। उन्हें चंडीगढ़ साहित्य अकादमी से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड भी मिल चुका है। इन दिनों वे अपने बेटे दिनेश के पास गुरुग्राम में रह रहे थे। उनकी बेटी डॉ. लतिका शर्मा पंजाब यूनिवर्सिटी के शिक्षा शास्त्र विभाग की चेयरपर्सन हैं। उनके निधन से चंडीगढ़ के साहित्यकारों में शोक की लहर है।

पीयू की हिंदी विभाग ने दो मिनट का मौन रखा
डॉ. परेश के निधन पर वीरवार को पीयू के हिंदी विभाग ने शोक सभा का आयोजन किया और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए मौन रखा। शोक सभा में पीयू के हिंदी विभागाध्यक्ष डा. गुरमीत सिंह, डा. नीरजा सूद, प्रो. बैजनाथ प्रसाद, अशोक सभ्रवाल और डॉ. सत्यपाल सहगल भी मौजूद रहे। इनके निधन पर प्रोफेसर जय प्रकाश, प्रोफसर राणा नैयर, प्रोफेसर मंजु जैदका, केके रत्तू, फूलचंद मानव, माधव कौशिक, सुभाष रस्तोगी, फूलचंद मानव, माधव कौशिक, सुभाष रस्तोगी, प्रो. वीरेंद्र मेहंदीरत्ता,  प्रेम विज और प्रसून प्रसाद सहित कई साहित्यकारों ने शोक जताया है।
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हिंदी साहित्य की हुई भारी क्षति
डॉ. परेश के निधन से हिंदी साहित्य को भारी क्षति हुई है। इसकी कमी को पूरा नहीं किया जा सकता है। वे बहुत ही विनम्र स्वभाव के थे। वे पूर्वाग्रह से मुक्त व्यक्तित्व के व्यक्ति थे। उन्होंने अपनी किताबों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया है।
- डा. चंद्रत्रिखा, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

उनकी कहानियां जन मानस को प्रभावित करती हैं
डा. परेश हिंदी के महान साहित्यकारों में से एक थे। 60-70 के दशक में उनकी कहानियां पूरे भारतीय जनमानस को प्रभावित करती थीं। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी के प्रिय शिष्य होने के साथ ही उनकी पूरे देश में प्रतिष्ठा थी। पीयू में हिंदी के प्रोफेसर होने के नाते उन्होंने इस आंचल में बहुत से साहित्यकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित किया। वे बहुत गंभीर और विनम्र स्वभाव के व्यक्ति के थे। कुछ साल पहले उन्हें चंडीगढ़ साहित्य अकादमी की ओर से अवार्ड आफ रेकिग्नेशन से सम्मानित किया गया था। मुझे अब भी याद है कि उन्होंने यह सम्मान बहुत ही गुजारिश के बाद लिया था।
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- माधव कौशिक, चेयरमैन, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी
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